कौरव-पांडवों के बीच क्रिकेट मैच

‘संजय तू चुप क्यों हो गया, बताता क्यों नहीं कि आगे क्या हुआ?’ धृतराष्ट्र बड़े अधीर हुए जा रहे हैं।
‘महाराज, आपका एक और पुत्र आउट हो गया। इनको कुछ खिलाया-पिलाया नहीं क्या?’ संजय ने टांट मारा। इंटरनेट के जरिए संजय घर पर बैठे-बैठे ही धृतराष्ट्र को कॉमेंटरी सुना रहे हैं।
‘महाराज मैं हूं, तू मुझे नसीहत दे रहा है!’
‘महाराज, मैच बचाओ मैच, लगता है यह भी हाथ से जाने वाला है। उन पांच ने ही 50 ओवर में 320 ठोंक दिए और अभी आपके 50 भी नहीं बने।’
‘संजय तू चिंता न करे, याद है कैसे चौसर में हराया था इन पांडु पुत्रों को।’ फिर गूगल की ब्रेल लिपि सर्विस के सहारे उन्होंने विकीपीडिया खोलकर संजय के सामने रख दिया।
‘महाराज वह अलग जमाना था। अब तो थर्ड अम्पायर की नजरों से कुछ बचता नहीं है। तब शकुनी की चल गई थी। अब कहां है शकुनी?’
(यहां हम बता दें कि इस समय शकुनी हस्तिनापुर की एक जेल में चार सौ बीसी काट रहा है।)
‘फिर भी हम ही जीतेंगे।’ महाराज गूगल ग्लास के जरिए कुछ न कुछ अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे हैं।
‘लो, एक और गया।’
‘अभी तो दुर्योधन ओर दु:शासन दोनों बचे हैं। देख लेना ऐसे छक्के छुड़ाएंगे कि क्रिकेट-विकेट सब भूल जाएंगे ये पांडु पुत्र। फिर नए प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी की बात करना तक भूल जाएंगे।’
‘हां, पर इधर भी अभी नकूल और सहदेव ही आए हैं बॉलिंग करने। उन्होंने ही आपके 17 विकेट चटकाय दिए हैं। लो, एक ही बाॅल में आपके दो सुपुत्र आउट हो गए।’
‘नहीं-नहीं, यह तो कृष्ण का अन्याय है। मुझे भी क्रिकेट आता है। एक ही बाॅल पर दो कैसे अाउट हो सकते हैं?’
‘एक कैच आउट हो हो गया और दूसरा रन आउट।’
‘सरासर अन्याय, मेरे साथ शुरू से ही अन्याय होता आया है। यह सब कृष्ण की चाल है। हमारे पास ऐसा कोच क्यों नहीं है?’
‘कृष्ण ने तो पहले ही ऑफर दिया था कि या तो मेरा किट, समझते हो ना किट यानी बैट, पैड, ग्लब्स ले लो या मेरी कोचिंग। आपके दुर्योधन, महल में रहते हैं, लेकिन कृष्ण के बैट पर ऐसे ललचाए कि क्या कहें! और कोचिंग पांडवों को मिल गई।’
थोड़ी देर बाद।
‘लो महाराज, 98वां विकेट भी गया।’
‘अरे ये दु:शासन क्या कर रहा है? खेलता क्यों नहीं?’
‘लगता है आपके अल्जाइमर का इलाज करवाना ही पड़ेगा। वह तो एक घंटे पहले ही निपट गया था। बताया तो था मैंने।’
‘ओ हो, हां हां। और दुर्योधन? वह तो खेल रहा है ना?’
‘हां, एक सिरा संभाल रखा है, पर बाकी तो आयाराम-गयाराम। उसने भीम की अच्छी धुनाई की है। अर्जुन की बाॅलों पर थोड़ा असहज है।’
‘वो तो बाहर से कृष्ण टिप दिए जा रहा होगा अर्जुन को, और क्या!’
‘लो, अब दुर्योधन भी गया। अर्जुन की बाहर जाती द्रौपदी, ओ माफ करना बॉल को छेड़ दिया। काॅट बिहाइंड। डेढ़ सौ से हार गए।’
‘मैंने पहले ही कहा था, क्रिकेट मत खेलो। हॉकी खेलो। मानते कहां।’ धृतराष्ट्र निराशा से बोले।
‘हां, ये सही है। एक-एक पांडव पर 20-20 कौरव। ये सही रहेगा। पर यशोदानंदन की कोचिंग तो वहां भी होगी। क्या-क्या खेलोगे महाराज?’ संजय लागआउट करते हुए बोले। नए प्रोजेक्ट में पांच पर्सेंट तो हिस्सा मांग रहे हैं। दे क्यों नहीं देते? फिर मोबाइल पर खुद ही रिंग बजाकर इस बहाने के साथ बाहर निकल आए कि कोई इम्पोर्टेंड कॉल आई है।