गांधारी युग की उत्तरकथा

डॉ. प्रेम जनमेजय

मित्रों कहा जाता है कि महाभारत का मूल रूप उपलब्ध नहीं है। उसके अनेक रूप हैं। जिसके अनेक रूप हों उसे प्रामाणिक सिद्ध करना कठिन हो जाता है। महाभारत का एक ऐसा ही रूप मुझे प्राप्त हुआ है। आप अपनी अज्ञानतावश कह सकते हैं कि यह स्वरूप सत्य नहीं है परंतु मैं अपनी ‘ज्ञानतावश’ कहूंगा कि यही सही है।
खैर, मुझे महाभारत के एक संस्करण में निम्नलिखित प्रसंग मिला है। यह विषय शोधकर्ताओं के लिए शोध का, टीवी वालों के लिए जुगाली का और स्तंभ लेखकों के लिए स्तंभित लेखन का हो सकता है। आप से अनुरोध है कि जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी के अनुसार इसका प्रयोग करें। इस कथा को सुनने से प्रजातंत्र के प्रति अनावश्यक मोह गायब हो जाता है और स्वयं को कठपुतली होने का बोध होता है।

अथ गांधारी युग कथा

धृतराष्ट्र उद्विग्न-से अपने कक्ष में संजय की प्रतीक्षा कर रहे थे। बहुत दिनों से वे देख रहे थे कि संजय उनके पास आने से बच रहे हैं। आ भी जाते है तो आंखों देखा हाल सुनाने से बचते हैं। संजय कभी हाल सुनाते भी हैं तो लगता है जैसे संपादित अंश सुना रहे हों। धृतराष्ट्र ने अनेक बार सोचा कि वे संजय को उसकी हरकतों के लिए सवाल करें, उसे डांटे पर यह सोचकर रुक गए कि यदि संजय ने त्यागपत्र दे दिया तो…। तो, वे तो बिल्कुल अंधे ही हो जाऐगें। आजकल के सेवकों में सहनशीलता रह कहां गई है। अच्छे सेवक बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। तनिक-सा क्रोध दिखाओं तो आंखें दिखाने लगते हैं और नौकरी छोड़ने की धमकी देते हैं। इनके दिमाग बहुत चढ़ गए हैं।

पर आज धृतराष्ट्र  पूरे मूड में हैं कि वे संजय से सवाल अवश्य करेंगे। धृतराष्ट्र आज बेसब्री से संजय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। संजय को अनेक बुलावे आ चुके थे इसलिए वे भी आ रहे थे। संजय की पदचाप को धृतराष्ट्र बखूबी पहचानते थे। धृतराष्ट्र उन पदचापों को भी पहचानते थे जो लगती तो संजय जैसी थीं पर थीं नहीं और धृतराष्ट्र के कौन कहने पर मौन हो जाया करती थीं। आज भी संजय की असली पदचाप को धृतराष्ट्र ने सुना तो प्रसन्न हो गए। पदचाप के निकट आने पर धृतराष्ट्र ने कहा – आओ संजय, मेरे पास बैठो। आज मेर मन बहुत उद्विग्न है, तुम तो मेरे बहुत ही पुराने और विश्वसनीय मित्र जैसे हो, मेरे पास बैठो।’

– नहीं महाराज, मैं अपने स्थान पर ही उचित हूं।’

– संजय, मुझे तुमसे कुछ गुप्त बात करनी है, प्रहरी से कहो कि द्वार बंद कर दे और सांकल लगा दे।

– महाराज, मैंने आपको बताया ही था कि सांकलें तोड़ दी गई हैं और द्वार बंद नहीं होते हैं।

– अभी तक ठीक नहीं हुईं, तुमने किसी से कहा नहीं कि इस द्वार को ठीक…

– महाराज, ठीक तो वह होता है जो स्वयं बिगड़े पर जिसे दूसरे ने बिगाड़ा हो उसे… महाराज, मैंने रानी गांधारी के कार्यालय में प्रार्थना पत्र भिजवा दिया था।

– गांधारी के कार्यालय में क्यों ?

– आजकल समस्त आदेश वहीं से आते हैं। आप भी जिन आदेशों पर हस्ताक्षर करते हैं, वे भी वहीं से आते हैं। आपको संभवतः ज्ञात ही होगा महाराज।

धृतराष्ट्र के पास हूं के अतिरिक्त कुछ कहने और विवशता में हाथ मलने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। कुछ क्षण सहज होकर धृतराष्ट्र ने कहा- संजय यह तो कह कि इस समय मेरे प्रिय साले, शकुनि जी क्या कर रहे हैं?

संजय- क्षमा करें महाराज, उसका वर्णन मैं नहीं कर पउंगा।

धृतराष्ट्र- क्यों संजय, क्या तुम्हारी दिव्य दृष्टि में दोष आ गया है?

संजय- प्रभु मेरी दृष्टि तो वही है पर कुछ क्षेत्रों का वर्णन मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं रहा है।

धृतराष्ट्र- यानि कि कुछ क्षेत्रों की जानकारी मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं रही है।’ धृतराष्ट्र उद्विगन हो गए।

हालांकि धृतराष्ट्र इतने भी अंधे नहीं हैं कि यह न जाने कि सब उनको ढाल बनाकर महाभारत का युद्ध लड़ना चाहते हैं जिससे जीतने पर दुर्योधन की जय जयकार कर सकें और पराजित होने पर धृतराष्ट्र की घोर निंदा कर सकें।
संजय ने कहा – महाराज दुर्योधन और शकुनि की व्यवस्था में मैं अशक्त हो गया हूं। मैं जहां भी अपनी दिव्य दृष्टि को प्रेषित करता हूं उसका मार्ग दृष्टि बाधक यंत्र रोक लेते हैं। अनेक बार मुझे लगता है कि मेरी जैसी अनेक छायाएं मेरे चारों ओर विचरण कर रही हैं। महाराज मैंनें आपका और हस्तिनापुर का नमक खाया है और आपके प्रति प्रतिबद्ध हूं परंतु जैसे सशक्त पुत्र के समक्ष अशक्त पिता विवश होता है, नंगे के सामने ईश्वर भी विवश होता है, अनैतिकता के समक्ष नैतिकता विवश होती है, द्रौपदी चीर-हरण पर बुजुर्ग पीढ़ी विवश थी तथा धनवान के समक्ष न्याय विवश होता है वैसे ही मैं भी विवश हूं।

गांधारी के पास अनेक संजय थे जो विभिन्न क्षेत्रों के प्रभारी थे। संजय एक रनिवास का प्रभारी था जहां कुंति समेत अनेक ‘माताएं ’रहती थीं। संजय दो भीष्म के महल का प्रभारी था। संजय तीन ‘महाराज’ धृतराष्ट्र के मुख्य कक्ष का प्रभारी था। इसी प्रकार द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि महारथियों के विभिन्न क्रमांक के संजय प्रभारी तो थे ही, अनेक कौरवों के भी प्रभारी भी थे।

धृतराष्ट्र जन्मांध थे, उन्होंने सृष्टि का एक ही रूप अपने अनुभव से जाना था- अंधकारी रूप। शेष तो उन्होंने वही जाना था जो उन्हें जताया गया था। परंतु गांधारी ने तो जन्म से लेकर युवावस्था तक सृष्टि के हर रूप और रंग को देखा था। गांधारी ने तो युवावस्था में बलात् अपनी आंखों में पट्टी बांधकर स्वयं को दृष्टिबाधित किया था। युवावस्था में भविष्य के लिए बाधित दृष्टि बहुत ही खतरनाक होती है। पट्टी के अंदर अनेक स्वप्न होते हैं जिसे वे बाहर के विश्व में साकार करना चाहती है। गांधारी को तो व्यवस्था ने विवश किया था पट्टी बांधने को। पट्टी बंधी थी परंतु वह दृष्टि को बाधा पहुंचाने में सक्षम नहीं थी। सामान्य मनुष्य की तो दो आंखों होती हैं परंतु गांधारी की अनेक संजयों के रूप में इंद्र से भी अधिक आंखें थीं।

गांधारी- युग चहुं ओर पसरा हुआ था।

(Short version)
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