#Triple_Talaq विजय दिवस : पतियों की तरफ से कुछ शेर अर्ज़ हैं

पतियों की तरफ से कुछ शेर अर्ज़ हैं, पत्नियां गौर करें…

जब भी कुछ खाने लगता हूं मुझे वो रोक देती है।
लगाकर तो कभी तड़का तवे पर झोंक देती है।
जिस्म का दर्द ये कैसे कहूं के तुम ही बतलाओ।
कभी बेलन, कभी करछी, मुझे वो ठोंक देती है।
मैं कुछ कह नहीं सकता कि वो ही भोंक देती है।
कभी कुछ कह भी दूं तो बीच में ही टोक देती है।
के दो कौड़ी की है औकात अब अपनी यहां यारों।
कभी मैं मांग लूं लस्सी, मुझे वो कोक देती है।
के घर के बाहर जाकर खुद को मैं आज़ाद करता हूं।
के मैं तो रो ही देता हूं उसे जब याद करता हूं।
जन्म हो सातवां मेरा इस शादी के बंधन का।
बंधु न अब कभी उस संग यही फ़रियाद करता हूं।
डिनर में नखरा कर दूं तो मेरी शामत आ जाती है।
वही सब्जी, वही दालें, रोज लौकी खिलाती है।
नज़र वो मुझ पर रखती है हमेशा संग-संग रहकर।
छाती पर मूंग दलती है, कभी ना मायके जाती है।
उसे सब गोलगट्टम-लक्कड़-फट्टम- क्रिकेट बुलाते हैं।
मुझे सब सेट कहते हैं उसे सब हैंड बुलाते हैं।
कहूं कैसे कि खुश हूं मैं, सभी की बात सुनकर जी
मुझे सब ताड़का का , हसबैंड बुलाते हैं।

Courtesy : Social Media

(Disclaimer : इसका संबंध तीन तलाक इश्यू से नहीं है।)