यक्ष प्रश्न और सहदेव की होशियारी

अनुज खरे

जब पांडव अज्ञातवास में जंगल-जंगल घूम रहे थे, किस्सा तब का है। छोटा-सा है। चिंता घोर, चिंतन विकट है। प्यासे पांडवों के लिए युधिष्ठिर के कहने पर सहदेव आज्ञा वगैरह की फॉर्मिलिटी पूरी कर पानी लाने निकल पड़े। तालाब के पास पहुंच जैसे ही लोटा जल में डुबोया, एकाएक हाहाकारी किस्म का बैकग्राउंड म्यूजिक शुरू हो गया। सहदेव ने लोटा मजबूती से थाम लिया। ठोस सोने का है। ऊपर से पुश्तैनी है। इस हाहाकारी किस्म के सीन के बीच कोई छीन-छानकर ले गया तो भ्राताओं को हिसाब देते नहीं बनेगा। तभी तालाब के बीचों-बीच एक दिव्य किस्म का व्यक्ति अवतरित हुआ। पहले तीन मिनट तक हंसा। फिर बिना कोई इंट्रोडक्शन दिए शुरू हो गया। ‘यह मेरा जलाशय है, जो मेरे प्रश्नों का जवाब देता है, वही इससे पानी ले सकता है।’
यक्ष के प्रश्न पूछने से पहले ही सहदेव बोले, ‘प्रश्न-वृश्न तो गुरु हमसे न पूछो। इसी चक्कर में अपन क्लास में सबसे पीछे बैठते थे। हमें तो जबर्दस्ती धनुर्विद्या सिखाई जा रही थी। अपन तो गुलेल मारकर किसी का टकला फोडऩे के एक्सपर्ट हैं। गदाधारी भीम और गांडीवधारी अर्जुन की तरह अपन भी गुलेलधारी कहलाते। लेकिन तुम तो जानते ही हो लोककलाओं को किसी भी देशकाल में प्रश्रय नहीं मिला। सरकार योजनाएं बनाती है तो नकली कलाकार प्रसिद्धि पा जाते हैं। असली तो एकलव्य टाइप गुमनामी में ही खो जाते हैं। हमीं को लो, बस्ते में बंटे-कंचे भरकर लाते थे कि मौका मिले तो गुलेल चला लें। षड्यंत्र देखो द्रोण का, एकलव्य टाइप का मामला हमसे नहीं बैठा पाए तो बस्ते का बोझ बताकर एक कमेटी बना डाली। एकलव्यों से ऐसे ही रबड़ी छीनकर अर्जुन को खिलाई जाती है।’ यक्ष टुकुर-टुकुर सुन रहा है।
इसके बाद आपको क्या लगता है, क्या हुआ होगा? चुनाव नजदीक था, सहदेव की भाषण कला से खुश होकर यक्ष ने उसे अपना भाषण राइटर रख लिया। बदले में आसपास के इलाकों में तालाब के पानी की सप्लाई की ठेकेदारी सौंप दी। पांडव इंतजार में हैं। यक्ष चुनाव जीत चुका है। सहदेव बड़े ठेकेदार हो गए हैं।
सबक – उस बंदे का हर देशकाल में बड़ा सम्मान होता है, जो यक्ष के ‘यक्ष प्रश्न’ पूछने से पहले ही उससे बड़ी समस्या सामने रखकर जनता को कन्फ्यूज करने की काबिलियत रखता हो।
कार्टून : गौतम चक्रवर्ती