काका हाथरसी के रंगरसिया दोहे

फागुन को लगने लगे, वैसाखी के पाँव
इसीलिए पहुँचा नहीं, अब तक अपने गाँव।

क्या वसंत का आगमन, क्या उल्लू का फाग
अपनी किस्मत में लिखा, रात-रातभर जाग।

जरा संभल कर दोस्तो, मलना मुझे अबीर
कई लोगों का माल है, मेरा एक शरीर।

देख नहाए रूप को, पानी हुआ गुलाल
रक्त मनुज का फेंक कर, उसमें विष मत डाल।

उस लड़की को देखकर, उग आई वो डाल
जिस पर कि मसले गए, एक कैरी के गाल।

  • काका हाथरसी, हास्य कवि 

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