राजनीति की चौसर पर श्वेत-पत्र का सच

(अतिथि व्यंग्यकार) ब्रजेश कानूनगो

अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है जब वर्तमान सत्ता पक्ष ने पूर्व सरकार से आग्रह किया था कि वह विदेशों में जमा काले धन पर सही-सही श्वेतपत्र लाए और देश की जनता को आश्स्वस्त करे। काला धन जब आए तब आए मगर श्वेत-पत्र लाने का यह मामूली कार्य जरूर प्राथमिकता से अब किया जा सकता है। मेरे मित्र साधुरामजी का कहना है कि परिवर्तन के इस महादौर में इस बार सरकार श्वेत-पत्र की बजाए रेड पेपर या ब्लेक पेपर ले आए तो क्या हर्ज है? क्यों बेकार में विरोधियों को यह कहने का अवसर देना चाहिए कि सब कुछ पहले जैसा ही हो रहा है।
ऐसा नही है कि काले धन पर पहले श्वेत पत्र नहीं लाया गया, लेकिन विशेषज्ञ कहते रहे हैं कि कालेधन पर पूर्व में जो श्वेतपत्र जारी किया गया था उसमें काफी कमियाँ थीं। कुछ का मानना था कि वह मात्र एक कोरा कागज था। न तो इसमें कालेधन के स्वामियों के नाम उजागर हुए और न ही इन्हें भारत में वापिस लाने के कोई उपाय सुझाए गए थे । अब यह कमी दूर की जा सकती है। उस वक्त सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया तो यह आई कि पूर्व श्वेतपत्र किसी ‘बिकनी’ की तरह था जो महत्वपूर्ण हिस्सों को छुपाकर कम महत्व की चीजों को उजागर कर रहा था। मैं उन वरिष्ठ नेता के बयान से घोर असहमत रहा हूँ। श्वेतपत्र यदि ‘बिकनी’ की तरह था और महत्वपूर्ण हिस्सों को छुपाकर कम महत्व के हिस्सों को प्रदर्शित करता था तो वह बिकनी की तरह कैसे हो सकता है ? बिकनी में हमारे शरीर के हाथ, पाँव, सिर आदि पूरी तरह दिखाई देते हैं। चाहें तो अब नए पत्र से बिकनी की आड़ भी हटाई जा सकती है। काले धन का पूरा सच जनता के सामने लाया ही जाना चाहिए।
जहाँ तक श्वेत या अन्य रंग की बात है तो इसे जरा यों समझने की कोशिश करें। दरअसल जो लोग थोड़ा बहुत रंगों या फोटोग्राफी की समझ रखते होंगे वे ‘कांट्रास्ट’ की अवधारणा को भी समझते होंगे । अब देखिए यदि रात को आसमान की कालिमा और सितारों के बीच कांट्रास्ट नहीं होता तो क्या हम उस अद्भुत वातावरण और खूबसूरत चांदनी का आनन्द उठा सकते थे।
कालेधन पर श्वेतपत्र जारी करके सरकार जब कांट्रास्ट का प्रभाव पैदा करती है तब वह कला में उसकी समझ को भी प्रमाणित करता है। चूंकि धन जो है वह काला है, इसलिए उसे उजागर या स्पष्ट करने के लिए सफेद से बेहतर कोई पृष्ठ्भूमि हो ही नहीं सकती, इसलिए श्वेतपत्र लाया जाता है । रेड पेपर या ब्लेक पेपर भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है ,लेकिन इसमें बड़ा झमेला खड़ा हो सकता है । पहले तो ब्लेक पेपर में उतना कांट्रास्ट नहीं बनता। ब्लेक में ब्लेक मनी का सही सही चित्र उभर नहीं पाता। जनता को लग सकता है कि सरकार की नीयत ठीक नहीं है और वह कालेधन के प्रश्न पर ईमानदार नहीं है। रेड पेपर प्रस्तुत करने का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता। बहुत वर्षों तक सुनते रहे थे- ‘ये लाल रंग कब मुझे छोडेगा..’ । सरकारों का मानना रहा है कि लाल रंग से जितना दूर रहें उतना अच्छा। सो, कालेधन पर श्वेतपत्र लाना ही सरकार की मजबूरी होती है और एकमात्र विकल्प भी। साधुरामजी को मैं बार बार समझा रहा हूँ लेकिन वे अभी भी अड़े हुए हैं कि हर बार श्वेतपत्र ही क्यों? कुछ बदलाव तो होना ही चाहिए।

(Disclaimer : इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं। वेबसाइट http://hindisatire.com इसके लिए जवाबदेह नहीं है।)