बहुत पकड़ में आ रहे हैं रंगे हाथ, बातचीत की तो जबान पर आ गया रंगे हाथ का दर्द…

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By Jayjeet

पिछले कुछ दिनों से कुछ नाकारा लोगों के रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ में आ जाने की खबरों से रिपोर्टर बड़ा हैरान और परेशान था। सवाल ही इतना बड़ा था। आखिर रिश्वत लेता कोई हाथ पकड़ में आ भी कैसे सकता है? रिपोर्टर ने ठान ही लिया कि आज तो उस रंगे हाथ की खबर लेकर ही मानेगा।

रिपोर्टर : आखिर पकड़ ही लिया मैंने रंगे हाथ पकड़ में आने वाले हाथ को…

रंगा हाथ (हाथ छुड़ाने की असफल कोशिश करते हुए) : मैं वो हाथ नहीं हूं जी। मैं तो होली में रंगा हाथ हूं…

रिपोर्टर : हम रिपोर्टर हैं तो क्या हुआ, इतने भी मूरख नहीं हैं कि हाथ-हाथ में फर्क ना समझ पाए। गब्बर लोग होली खेलकर कब के वापस चुनावों में बिजी हो गए हैं। हमें ना बनाओ अब..

रंगा हाथ : हां, अब आपसे क्या छिपाना। लेकिन आप हाथ धोकर हमारे पीछे क्यों पड़े हो जी?

रिपोर्टर : आपसे खास चर्चा करनी है, इसलिए। बल्कि आपकी खबर लेनी है।

रंगा हाथ : देखिए, मैं छोटा-सा मासूम हाथ। पहले से ही बहुत टेंशन में हूं। आप सवाल पूछेंगे तो और टेंशन में आ जाऊंगा।

रिपोर्टर : आप जैसे नाकारा हाथों को तो टेंशन में आना ही चाहिए। पकड़ में आकर आप न केवल पूरे सिस्टम को शर्मिंदा कर रहे हों, बल्कि रिश्वत लेने को मजबूर भोले-भाले प्राणियों में डर का माहौल भी बना रहे हो। देश में पहले से ही डर कम है क्या?

रंगा हाथ : लेकिन मैं तो केवल हाथ हूं, मुझे क्यों सुना रहे हों?

रिपोर्टर : रिश्वत लेने का तो शाश्वत नियम ही यह है कि इस हाथ लो तो उस हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए। महाभारत काल से यह चला आ रहा है। लाक्षागृह बनाने वाले इंजीनियर के हाथों ने भी तो रिश्वत ली होगी। आज तक सबूत ना मिले। और आप बाकायदा सबूत समेत पकड़ में आ रहे हों। एक-आध बार हो तो चलो, बेनिफिट ऑफ डाउट दे दें। लेकिन बार-बार…

रंगा हाथ : भाई साहब, माना आप परमज्ञानी हों। महाभारत काल की झूठी-सच्ची कहानियों की भी बराबर खबर रखते हो। लेकिन आप हमारी मजबूरी नहीं समझ रहे हैं।

रिपोर्टर : अब ऐसी क्या मजबूरी कि पकड़ में ही आ जाओ?

रंगा हाथ : आप तो पहले से ही समझदार हों। फिर भी हम समझा देते हैं। अगर हम पकड़ में आ रहे हैं तो गलती दो लोगों की है- एक वे जो हमें पकड़ रहे हैं। तो सिस्टम को हमसे से भी ज्यादा लज्जित करने वाले ये लोग हैं, हम नहीं। दूसरा, हम हैं तो बस मोहरें ही ना। हमारी अपनी तो वकत है नहीं। जिम्मेदार तो वह खाली पेट है। पता नहीं स्साले उस पेट में ऐसे क्या-क्या एसिड भरे हैं कि अंदर माल जाते ही तुरंत पचा डालता है। और फिर हमें उंगली करने लगता है। अब हमारी भी तो कोई लिमिट है कि नहीं। ओवरलोड होने से प्रोडक्टिविटी पर फर्क पड़ेगा ही।

रिपोर्टर : मतलब, समस्या कहीं और है और परेशान आप हो रहे हों?

रंगा हाथ : बिल्कुल, आपको यह बात समझ में आ गई, लेकिन उन्हें समझ में नहीं आ रही। मैं पहले भी कई बार बोल चुका हूं कि करप्शन के सिस्टम को हाईटेक कीजिए। जमाना कहां से कहां पहुंच गया और हमें आज भी टेबल के नीचे घुसने को कहते हैं…

रिपोर्टर : हम्म… आर्टिफिशियल इंटेलीजेंट कहते हैं उसे। आपको उसका इस्तेमाल करना चाहिए।

रंगा हाथ : आर्टिफेशियल-वेशियल, जो भी हो, हम तो इतने पढ़े-लिखे हैं नहीं। होते तो पकड़ में आते भला। पर हम जिन इंटेलीजेंट लोगों के हाथ हैं, उनके दिमाग में क्या भूसा भरा है। वे सोचें। आखिर हम कब तक बेइज्जत होते रहेंगे और पूरे सिस्टम को बेइज्जत करते रहेंगे।

रिपोर्टर : हां, आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूं।

रंगा हाथ : और हां, आपको भी हम गरीब ही मिलते हैं! हमें हरदम जोतने वाले, कोल्हू का बैल बनाने वाले पेट और दिमाग की तो खबर लेंगे नहीं…. है हिम्मत…???

रिपोर्टर (फोन पर एक्टिंग करने के बाद) : अच्छा, एक जरूरी काम याद आ गया। फिर मिलता हूं आपसे… विस्तार से बात करेंगे…।

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