#BhopalGasTragedy : जब एंडरसन यमलोक पहुंचा तो क्या हुआ था वहां…? पढ़ें पूरी दास्तां

Bhopal Gas Tragedy भोपाल गैस कांड

(आज भोपाल गैस त्रासदी की 35वीं बरसी है। एंडरसन की मौत पर पांच साल पहले लिखी रपट का पुन: प्रकाशन)

By A. Jayjeet

यमलोक में अज्ञात स्थान से विशेष रिपोर्ट। भोपाल गैस त्रासदी का गुनहगार वारेन एंडरसन जब 29 सितंबर को यमलोक पहुंचा तो वहां पहुंचते ही उसे त्रासदी के शिकार लोगों ने घेर लिया। एंडरसन के साथ क्या हुआ, शिकार लोगों की उससे क्या बातचीत हुई, यह सारा विवरण यमलोक में लगे कैमरों में कैद हो गया। इसकी एक सीडी hindisatire.com को प्राप्त हुई है। एंडरसन के साथ हुई बातचीत और उसके साथ हुए बर्ताव का विवरण हम यहां पेश कर रहे हैं। भोपाली शैली की गालियों को हमने सेंसर कर दिया है।

“अबे (भोपाली गाली), आ गया तू? तेरा ही इंतजार था इतने वर्षों से।” त्रासदी के शिकार एक व्यक्ति की कड़क आवाज।
(एंडरसन नीचे पलके झुकाए) “हां, मैं आपका गुनहगार हूं।” तभी एक सनसनाता हुआ जूता आया और एंडरसन के मुंह पर लगा। पहले से ही लाल चेहरा और भी लाल हो गया। चश्मा भी नीचे गिर गया।
“तुम अमेरिकी स्साले, हम सब भारतीयों को कुत्ता समझते हों?”
यह गाली सुनकर एंडरसन को भी गुस्सा आ गया। फिर भी सधे स्वर में बोला- “हां, मैं मान रहा हूं कि मैं गुनहगार हूं। पर जरा जवाब दीजिए। मैं तो घटना के बाद तीन दिन में ही हिंदुस्तान बल्कि भोपाल आ गया था। एयरपोर्ट पर आपके ही किन्हीं दो अफसरों (याददाश्त पर जोर देते हुए) शायद ‘मोटी सिंह’ और ‘राज पूडी’ ने मेरा मुस्कुराते हुए स्वागत किया था। कसम से, अगर मेरा अमेरिका होता और वहां ऐसी घटना होती तो हम मेरे जैसे जल्लाद को उसी समय जेल में बंद कर देते। लेकिन आप लोगों के वे अफसर मुस्कुरा रहे थे। फिर मुझे गेस्ट हाउस में ले गए। पूरी मेहमान नवाजी की। मैं इस घटना के बाद से ही अपनी कंपनी द्वारा की गई लापरवाही पर शर्मिंदा था, आप सैकड़ों लोगों की मौत मुझे कचोट रही थी। इसलिए मैं तत्काल अमेरिका से हिंदुस्तान आया। अमेरिका से भोपाल आते समय मैं 26 घंटे हवाई जहाज में रहा। इस दौरान मैं न किसी से कुछ बोला, न कुछ खाया। लेकिन हिंदुस्तान में कदम रखते ही आपके अफसरों को मेरा स्वागत करते देखा। आपके प्रिय नेताओं को मेरे पक्ष में साजिश करते देखा तो मेरी सारी आत्मग्लानि दूर हो गई। मैंने सोचा, जिस देश में ऐसे हरामखोर नेता और भ्रष्ट अफसर हों, वहां की जनता इसी तरह मरने के लायक है।”
‘ऐ एंडरसन (फिर भोपाली गाली) , जुबान संभालकर।’
“तुम लोग तो उसी दिन ऊपर आ गए थे, लेकिन मैं आपके नेताओं और अफसरों की बदौलत अमेरिका चला आया। वहां मेरे अफसरों ने जो बताया तो मेरे रौंगटे खड़े हो गए?”
“क्या, क्या?” कई पीड़ित एक साथ बाेले।
“मेरे अफसरों ने बताया कि मेरी फैक्ट्री में गड़बड़ियां सालों से चली आ रही थीं। लेकिन तुम्हारे ही भारतीय अफसरों ने जानते-बुझते उन पर ध्यान नहीं दिया। बस उन्हें, उनका पैसा मिल जाता था।”
“साले कुत्ते अमेरिकी, तूने ही पैसे दिए हमारे अफसरों को, उन्हें करप्ट किया। तुझे तो तभी फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए था।” त्रासदी का शिकार एक व्यक्ति जोर से बोला।
तो एंडरसन भी पागलों की तरह जोर-जोर से चिल्लाने लगा-“यू बास्टर्ड करप्ट इंडियन्स! मेरी कंपनी के बड़े अफसर महिंद्रा और गोखले कौन थे? इंडियन्स। वे हिंदुस्तान में ही हैं। उन्हें क्यों फांसी पर नहीं चढ़ाया गया आज तक? 30 साल से केस ही चल रहा है। गजब हो तुम इंडियन्स, और लानतें मुझे भेजते हों! जिन अफसरों और नेताओं ने मेरा साथ दिया, वे क्यों सम्मान की जिंदगी जीते रहे, जी रहे हैं? लात मार-मारकर उन्हें भोपाल के तालाब में ही क्यों नहीं डुबो दिया गया?”
कुछ देर की चुप्पी, “और स्सालों। 30 साल बाद भी मेरी फैक्ट्री का जहरीला कचरा वहीं पड़ा है। उसे तुम ठिकाने नहीं लगा पाए और मुझे ठिकाने लगाने के सपने देखते रहे।” एंडरसन बोला। “और हां, यह भी सुन लो। तुम्हारे जाने के बाद मैंने पीड़ितों के लिए जो मुआवजा दिया था ना, करोड़ों का था। पर उसमें भी घोटाला। क्या मैंने किया यह घोटाला? किसने किया? तुम इंडियन्स ने। ऐसा घोटाला हुआ कि जिसे मुआवजा मिलना चाहिए था, उसे नहीं मिला। दूसरे ही हजम कर गए।”
फिर एंडरसन का जोरदार अट्टहास…।
वहां मौजूद भोपाल गैस पीड़ितों के जले पर मानो नमक। लेकिन कोई कुछ नहीं बोला। क्या बोलते। जिन लोगों के हाथों में चप्पलें थी, वे हाथों से छूट गईं। टूटी हुईं चप्पलें जमीन पर बिखर पड़ीं। हर चेहरे से आंसुओं की धारा बह रही थी। सबके सब दुखी,पराजित से…। ‘जब अपने ही सिक्के खोटे हों तो दूसरों को क्या दोष देना?’ सबके मन में बस यही एक भाव।
“और सुनो, सुन सको तो। अगर मैं हिंदुस्तान आ भी जाता ना, तो तुम मेरा कुछ नहीं उखाड़ पाते। मैं आराम से जेल में शाही जिंदगी जीता और बरी होकर स-सम्मान वापस अमेरिका आ जाता।” अट्‌टहास के बाद एंडरसन फिर जोर से चिल्लाया।
“तो तुमने ऐसा क्यों नहीं किया?” एक धीमी-सी आवाज।
“क्योंकि यदि मैं ऐसा करता तो शायद तुम लोगों को ज्यादा दुख होता। इतने साल तुम्हें या धरती पर रह गए तुम्हारे भाई-बहनों काे एक आस तो रही कि एंडरसन को भारत लाएंगे और उसे फांसी पर चढ़ाएंगे। यह अास पहले ही टूट जाती।” एंडरसन ने ठंडी सांस ली और फिर चुप हो गया…सिर नीचे झुका लिया।
पांच-सात मिनट का सन्नाटा। फिर यमलोक के एक कर्मचारी की सन्नाटे को तोड़ती आवाज, “मिस्टर एंडरसन, आपका फैसला हो गया है।”
“जी मुझे मालूम है। नर्क में ही जाना है ना!”
“जी हां” – यमलोक कर्मी बोला।
“मंजूर है।” फिर एंडरसन पीड़ितों की ओर मुखातिब होकर बोला, “दोस्तो, आपके हिंदुस्तान ने, आपके ही हिंदुस्तानियों ने आपको न्याय नहीं दिया। लेकिन यहां अापको न्याय मिल गया है… नाऊ बी हैप्पी, कुल मैन!!!”

पीड़ितों के चेहरों पर अब भी सन्नाटा-सा छाया हुआ है… लोगों ने आंसू पोंछ लिए हैं। कुछ चेहरे न चाहकर भी मुस्कुरा रहे हैं…
एंडरसन नर्क की ओर जा रहा है। उसके चेहरे पर भी मुस्कान है।

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