गणेशजी के चिंतन में फंस गए रे मूषकराज

ganesh with mouse

By JJ

अपने स्वामी को चिंतित मुद्रा में देखकर मूषकराज से रहा नहीं गया और वे बोल पड़े, ‘प्रभु, किस चिंता में खोए हुए हैं। इस भौतिक संसार में आए हैं तो दस दिन तो बिताने ही होंगे।’
‘मुझे अपनी चिंता नहीं है। सोच रहा हूं मेरे भक्त कैसे जीते होंगे। भोग तो तुम चख ही रहे हो। लड्डू में शक्कर के नाम पर कुछ दाने भर हैं। पता नहीं, घी की जगह क्या मिला रखा है।’
‘मैंने अपने सूत्रों से पता लगवाया है प्रभु, उसे यहां के लोग सिंथेटिक घी बोलते हैं।’ मूषकराज ने अपना ज्ञान बघारा।
‘यही तो मेरी चिंता का कारण है। आम आदमी भला क्या और कैसे खाता-पीता होगा!’ अपनी सूंड को दाएं से बाएं करते हुए प्रभु बोले।
‘स्वामी चिंता मत कीजिए। यह सब मिलावटखोरों का काम है। सरकार लगी हुई है। सब ठीक हो जाएगा।’ मूषकराज ने मासूमियत से कहा। दुनियादारी को लेकर मूषकराज की इस नासमझी पर गणेशजी को गुस्सा तो आया, पर बोले कुछ नहीं।
संवाद लगातार चल रहा था। इस बीच मूषकराज को भूख लग आई। उन्होंने पास ही प्लेट में रखे खीरे और केले के टुकड़ों की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि प्रभु ने टोक दिया, ‘क्या कर रहे हो मूषकराज? कुछ तो शर्म करो! सब्जियों और फलों के भाव क्या चल रहे हैं, मालूम है? बेचारे भक्त अपना पेट काटकर प्रसाद लगा रहे हैं तो उसे कम से कम प्लेट में ही पड़ा रहने दो।’
मूषकराज समझ गए कि बचे-खुचे चार-पांच दिन बहुत भारी पड़ने वाले हैं। गुरु कुछ ज्यादा ही सेंटी हो रहे हैं! क्या करें, दिन तो काटने ही हैं! भक्तों की चिंता में मग्न अपने स्वामी का ध्यान डायवर्ट करने के लिए मूषकराज ने पूछ लिया, ‘प्रभु, पानी पिएंगे क्या?’
‘ओ हो, पानी से ध्यान आया, अब तो ढंग से बारिश भी नहीं होती।’ प्रभु को चिंता का नया विषय मिल गया। मूषकराज ने अपना माथा ठाेंक लिया। उनका दांव उलटा पड़ गया था। अब सुनो खाली पेट पानी पर लेक्चर!
‘इंद्र का भी आजकल कुछ समझ में नहीं आता। कहीं घटाघोप, कहीं एक बूंद तक पानी नहीं।’ प्रभु ने चिंता जताई।
‘महाराज, इंद्र को ही दोष क्यों देते हो। अापके प्रिय भक्त दूध के धुले हैं क्या?’ मूषकराज ने टॉन्ट मारा।
‘सही बात है। जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरों को क्या दोष देना। भक्तों ने न जंगल रहने दिए, न नदियों, तालाबों, बावड़ियों की सुध ली। जो पानी इंद्र देते भी हैं, उसे भी सहेजने की कोई चिंता नहीं। अब चार-पांच दिन बाद मुझे जो ये लोग विदाई देंगे, उसके लिए भी पता नहीं इनके पास पानी है भी कि नहीं। जो थोड़ा-बहुत पानी हाेगा भी तो उसमें मेरी मूर्तियों को डालकर उसका सत्यानाश कर देंगे।’
मूषकराज माथा पकड़े हुए हैं। भूख से हाल बेहाल हुए जा रहे हैं। उधर प्रभु का चिंतन जारी है – अगले बरस फिर बुलाएंगे। वर्षों से आ रहा हूं, अंग्रेजों का जमाना भी देखा, लेकिन ऐसा तो कभी देखने में नहीं आया। हे भगवान! पता नहीं, और क्या-क्या दिन देखने बाकी हैं!

कार्टून : गौतम चक्रवर्ती