हरिशंकर परसाई का क्लासिक व्यंग्य ‘बकरी पौधा चर गई’

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हरिशंकर परसाई (Harishankar Parsai)

साधो, तुम सुनते आ रहे हो कि बागड़ खेत को खा ही गई और नाव नदी को ही लील गई और यह भेद आज तक किसी ने नहीं जाना। तुम इन उलटवासियों का दार्शनिक अर्थ निकाल लेते हो और रूपकों को समझ लेते हो। आज मैं तुम्हें एक समाचार सुनाता हूं और तुम इस रूपक का अर्थ बतलाओ। समाचार मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल का है- सचिवालय के अहाते में जो वटवृक्ष प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रोपा था उसे बकरी चर गई। कहते हैं, पौधे के आसपास जो चबूतरा था उस पर बकरी चढ़कर पत्ते खा गई। वहां जो चौकीदार था, वह भी पौधे को बचा नहीं पाया। इस समाचार को पढ़कर कुछ लोग आश्चर्य करते हैं, कुछ सरकार की गफलत को धिक्कारते हैं और कुछ क्रोध करते हैं, क्योंकि आखिर पंडितजी ने पौधा लगाया था। मगर साधुओं को किसी पर गुस्सा नहीं करना है। हमें ठंडे दिमाग से इस रूपक का अर्थ निकालना है।

साधो, इस घटना में चार बाते हैं-
1. पौधा पं. जवाहरलाल ने लगाया था।
2. उसकी रक्षा के लिए आसपास चबूतरा बनाया, मगर बकरी उसी चबूतरे पर चढ़कर उसे खा गई।
3. बकरी, जो पौधा खा गई,
4. चौकीदार ने उसे खा जाने दिया।

साधो, रूपक के न चारों अंगों पर ध्यान रखो। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखो कि रक्षक चौकीदार में और भक्षक बकरी में कोई गुप्त समझौता है। हो सकता है, बकरी ने पौधे को खाकर जो भीतर-भीतर दूध बनाया, उसे चौकीदार को दुह लेने दिया हो। यानी पौधा दूध के रूप में थोड़ा चौकीदार को भी किसी रूप में मिल गया हो।

साधो, अब अर्थ सुनो। पौधा पं. जवाहरलाल ने लगाया, यह सही है। यह पौधा 10-12 साल पहले ही लगाया गया था। प्रथम पंचवर्षीय योजना के समय यह पौधा लगाया गया था। तमाम इंतजाम किए गए थे। यह है राष्ट्रीय विकास का पौधा, जो था। इसके आसपास तमाम योजनाओं के चबूतरे बनाए गए। जैसे-ब्लाक डेवलपमेंट, सहकारी आंदोलन, विभिन्न प्रोजेक्ट। इसकी रक्षा के लिए चौकीदार खड़े हो गए या किए गए- यानी बड़े अफसर, मंत्री और नेता जैसे लोगों को लाया गया। साधो, मगर ज्यों ही पौधा बढ़ा, भ्रष्टाचार की बकरी आई। उसने चौकीदार से कहा- तू मुझे पौधा चर लेने दे। आखिर इसका दूध ही तो बनेगा। तू मुझे दुह लेना। चौकीदार ने बकरी को योजना के चबूतरे पर चढ़ जाने दिया और बकरी पौधा चर गई।

साधो, विकास के पौधे को इस तरह चरा जा रहा है। तुम देखते हो कि ब्लाक डेवलपमेंट अफसर की जीप 10 मील दूर तक लुढ़कती हुई पान खाने आती है। आधे मील सड़क बनाने का खर्च दो लाख रुपया तक आ जाता है। योजना का सामान उठकर बाजार में बिकने चला आता है। नया पुल पहली बरसात में ही बैठ जाता है, रास्ते बंद हो जाते हैं। इमारत बनते ही तिड़क जाती है। बांध की दीवार टूट जाती है और करोड़ो रु. पानी में बह जाते हैं। सैकड़ों टन गल्ला सरकारी गोदाम में सड़ जाता है। लाख रुपए की संस्था के उद्‌घाटन में दो लाख रुपए लग जाते हैं। साधो, लोग न चीजों का बड़े रोष से उल्लेख करते हैं। मैं कहता हूं क्रोध मत करो। पंडित जवाहरलाल के लगाए पौधे को बकरी चर रही है।

साधो, पंडित जवाहरलाल जगह-जगह तरह-तरह के पौधे लगा रहे हैं और उन्हें तरह-तरह की बकरी चर रही हैं। इधर जवाहरलाल पौधा लगाकर पीठ फेरते हैं और उधर बकरी चर जाती है। हाल ही में राष्ट्रीय एकता का पौधा लगा था। कितने ही नेताओं ने उसे अपने भाषण से सींचा था। पंडित जवाहरलाल ने खाद दिया था। पौधा लगाकर पंडित जवाहरलाल मदुराई गए। उधर उत्तरप्रदेश की सांप्रदायवाद की बकरी उसे चर गई। जवाहरलाल कांग्रेस के भीतर एकता का पौधा मदुराई में लगाकर हाथ धो ही रहे थे कि मध्यप्रदेश कांग्रेस के दलों ने कहा कि टिकिट के मसले पर हम एकमत हो ही नहीं सकते। इसलिए यह काम लालबहादुर शास्त्री को सौंपा जाए। पद-लोलुपता की बकरी कांग्रेस की एकता के पौधे को चर गई।

साधो, किस-किस पौधे को देखिए और किस-किस को रोइए। तमाम चौकीदार बकरियों से मिले हैं और वे चरे जा रही हैं।

साधो, भोपाल सचिवालय के अहाते में पौधा बकरी चर गई, यह आज लोगों को दिखा। चर तो कब से रही है। पिछली फरवरी में इसी मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय एकता के पौधे को बकरी चर गई थी। साधो, अब तो एक बड़ा मजबूत भयानक बकरा छुट्‌टा घूम रहा है। यह धर्म और संस्कृति की गंठी पहने फासिज्म का बकरा है। यह जनतंत्र के पौधे को तो क्या, झाड़ तक चर जाएगा। इसके सींगों से चौकीदार भी डरने लगे हैं। साधो, इसने बकरियों को मात कर दिया है। यह वट वृक्ष को चर जाने का हौसला रखता है।

साधो, पंडित जवाहरलाल से कहो कि पौधे लगाते हो तो उनके आसपास कांटों का तार लगवाएं जिनसे बकरे-बकरियां के थूथड़े फूट जाएं और चौकीदारों को या तो बदले में या उनका गला दबाकर दूध उगलवाएं। और अगर पौधे लगाने का शौक है तो उजाड़ू बकरे-बकरियों को कांजीहाउस में डालो। वरना तुम पौधे रोपोगे और ये चरते चले जाएंगे। और अखबार छापेंगे कि आज यहां का पौधा चर लिया और कल वहां का।