हरिशंकर परसाई का क्लासिक व्यंग्य ‘नया खून – पुराना खून’

सन् 1962 के आम चुनावों के लिए पार्टी टिकटों की कोशिशें चल रही थीं। कांग्रेस में मांग उठ रही थी कि संसद, विधानसभाओं और मंत्रिमंडलों में ‘नए खून’ को यानी नए उत्साही युवक कांग्रेसजनों को लिया जाना चाहिए। इसी परिप्रेक्ष्य में हरिशंकर परसाई (harishankar parsai) ने यह व्यंग्य लिखा था।

हरिशंकर परसाई

चुनाव में हमेशा नए खून को आगे लाने की वकालत की जाती है। पर सयानों को ये समझ में नहीं आता है। इनके दूध के दांत भी नहीं टूटे हैं। वे समझते ही नहीं कि जो पदों पर हैं, उनके ‘दूध के दांत’ टूट गए हैं और ‘मलाई’ के दांत भी टूट गए और अब नकली दांत लगाए हैं। पुराने आदमी को चुनाव जीतने की सब तरकीबें मालूम है, नए को लाकर क्या चुनाव हारेगी…?

साधो, फिर चुनाव आ रहे हैं और फिर नए खून की पुकार उठ रही है। यह तीसरा चुनाव है और हर बार शोर मचता है कि इस बार नए खून को चांस देना चाहिए। हर बार यह मजाक अच्छा नहीं लगता। राजनीति की यह बीमारी तुम्हें भी लग गई है और तुम भी कभी-कभी मेरा चमीटा उखाड़ने की बात करते हो।

साधो, नए खून की यह ‘पद लोलुपता’ हम सयानों को बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। क्या हो गया है इस पीढ़ी को! दूध के दांत भी नहीं टूटे और पद ग्रहण करने को लालायित हो गए। देखते नहीं हैं कि जो पदों पर हैं, उनके ‘दूध के दांत’ टूट गए हैं और ‘मलाई’ के दांत भी टूट गए और अब नकली दांत लगाए हैं।

साधो, नए खून को सोचना चाहिए कि उसके सामने तो पूरी जिंदगी पड़ी है, कभी भी पद पर बैठ सकेंगे। पर पुराने खून के दिन गिने-गिनाए हैं, उन्हें कुछ दिन और रह लेने दो। साधो, अगर केवल मानवतावादी दृष्टि से ही देखा जाए तो सभी पुराने खून का जमे रहना उचित मालूम पड़ता है। जब विधानसभाओं और संसद के आधे से अधिक सदस्य एम्बुलेंस में सभा-भवन जाया करेंगे और हर सदस्य के बगल में एक डॉक्टर बैठा करेगा, तब समझेंगे कि हमारा जनतंत्र सयाना हो गया।

साधो, तुम हंसते हो। सयानेपन के गुण नहीं जानते। सयानेपन में जो काम होते हैं उनसे मंगल होता है। दशरथ अगर कैकेयी से विवाह न करते तो राम को वन कौन भेजता? और राम वन न जाते तो रावण का नाश कैसे होता? साधो, समाज के मंगल के लिए दशरथ से सयानेपन में वैसी बात होना आवश्यक था। ऐसी ही बातें हमारे आज के ये राजा अगर करें, तो तुम उन्हें ‘भूल’ कहते हो। यह नहीं सोचते कि सयानेपन की ‘भूल’ से समाज का मंगल होता है। अधर्मी हो, साधो!

साधो, इस बात को दूसरी दृष्टि से भी देखो! अंग्रेजी में मुहावरा है-‘डाई इन हारनेस’, यानी घोड़ा हो तो उसे कसे-कसाए और आदमी हो तो पद पर काम करते-करते मरना चाहिए। यह बड़े गौरव की बात है। राज-पद पर जो व्यक्ति कसा-कसाया मृत्यु को प्राप्त होता है उसकी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ होती है। जिन्हें राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि कराना है, वे पद क्यों छोड़ें? उनके इस समारोह की तस्वीरें खिचेंगी, लड़का उन्हें बैठक में टांगेगा और बताया करेगा- ये हमारे पिताजी- राजकीय सम्मान के साथ… इससे आगामी पीढ़िया प्रेरणा प्राप्त करेंगी।

साधो, अगर पुराने खून के स्थान पर नया खून आ गया, तो बड़े पैमाने पर ‘अनएम्पलायमेंट’ (बेकारी) बढ़ेगी। सयानों की बेकारी बड़ी खराब होती है। बेकार आदमी ‘फ्रस्ट्रेशन’ (हताशा) से पीड़ित रहता है और उपद्रव करता है। इसलिए राष्ट्र का हित इसी में है कि पुराने नेता बेकारी की समस्या से पीड़ित न हों। उन्हें संस्मरण तक लिखने की फुरसत नहीं मिलनी चाहिए, वरना संस्मरण में ही ऐसा कुछ लिख देंगे कि गड़बड़ पैदा हो जाएगी।

साधो, पुराना आदमी अनुभवी होता है, वह मामूली गड़बड़ियों से घबराता नहीं है। महाराष्ट्र में कही जरा-सी गड़बड़ होती है तो नया खून चव्हाण एकदम दौड़-धूप, डांट-डपट करने लगता है। इधर अपने पुराने खून काटजू साहब हैं कि दंगे होते हैं, गोलियां चलती है, अर्थ-आयोग आलोचना करता है मगर वे धीर-गंभीर बने बैठे रहते हैं। पुराने खून की यही विशेषता है। वह धीर-गंभीर होता है। शास्त्र में ऐसे ही नायक को ‘धीरोदात्त’ कहा गया है, जिस पर नाटक और महाकाव्य लिखे जाते हैं।

साधो, पार्टी की दृष्टि से भी देखो। पुराने आदमी को चुनाव जीतने की सब तरकीबें मालूम हैं। वह जानता है कि किससे वोट लिया जा सकता है। उसका जीतना निश्चित है। नया आदमी एक चुनाव तो सीखने में ही हार जाएगा। पार्टी नए खूनों को टिकटें देकर क्या चुनाव हारेगी?

साधो, ये सब बातें तुम्हारी समझ में शायद न आई हों। मैं तुम्हें व्यावहारिक लाभ बताता हूं। देखो, पुराना आदमी किसी पद पर नहीं रहेगा तो जनता को बड़ी तकलीफ होगी। तुम अपने पर से ही देखो- मान लो तुम्हारे पास गैर-कानूनी गांजा पकड़ा गया और तुम गिरफ्तार कर लिए गए। अगर कोई पुराना नेता राजकीय पद पर है, तो मैं उसे लेकर अफसरों के पास जाऊंगा और तुम्हें छुड़ा लूंगा। पुराने नेता के अफसरों से घनिष्ठ संबंध रहते हैं। नए नेता को कौन अफसर पूछता है! और नए आदमी से यह कहने में भी मुझे संकोच होगा कि अखाड़े के कुछ साधु गांजा रखने के लिए पकड़े गए हैं, उन्हें छुड़वा दो। साधो, सयाना आदमी अभ्यास से चतुर हो जाता है। नया आदमी पांच साल जनता की इस रीति से भलाई करना सीखने में ही गुजार देगा।

साधो, मैंने तुम्हें पुराने खून के लाभ समझाए। मैं उस दिन की कल्पना करके प्रसन्न हो उठता हूं जब सचिवालय और विधान परिषदों के सामने एम्बुलेंस खड़ी रहेंगी और राजकीय नेता स्ट्रेचर पर भीतर ले जाए जाएंगे, जनता के प्रति अपने कर्तव्य पूरे करने।