#इब्नबतूता की आत्मा रिटर्न्स – 2 : तुगलक को ढूंढते-ढूंढते CAA के फेर में फंसी आत्मा

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By Jayjeet

धुंध और धुएं से जूझते हुए जिस समय इब्नबतूता की आत्मा ने दिल्ली के इंडिया गेट के पास लैंडिंग की, उस समय घड़ियां सुबह के आठ बजा रही थीं। कहीं दूर गणतंत्र दिवस परेड की तैयारियों की आवाज सुनाई दे रही थी, पर नजर कुछ नहीं आ रहा था। नीचे तो धुंध और भी घनी थी। तभी कुछ साइकिल वाले उसके पास से गुजरे। उसने हाथ हिलाकर उन्हें रुकने का इशारा किया। लेकिन शायद धुंध में इन साइकिल वालों को भी कुछ नजर नहीं आया। या शायद इसलिए भी नहीं रुके कि भला आत्मा उन्हें कैसे दिखाई देती!

मौसम में ठंड इतनी जबरदस्त थी कि आत्मा भी अंदर तक कंपकंपा उठी। उसने सिर को अपनी मोरक्कन स्टाइल की पगड़ी से कसकर ढंक लिया। वह सबसे पहले उस जगह को देखना चाहती थी जहां करीब 650 साल पूर्व वह मोहम्मद बिन तुगलक के दरबार में जज हुआ करती थी। यह एक सामान्य प्रवृत्ति है कि वर्षों बाद जब आदमी लौटता है तो वह उन्हीं जगहों को तलाशता है, जहां वह रहा करता था। आत्माएं भी इस प्रवृत्ति से मुक्त नहीं होतीं। इसीलिए खंडहरों में घूमती आत्माओं के किस्से अक्सर न्यूज चैनलों पर दिखाई देते हैं।

लेकिन बतूता साहब की आत्मा तुगलक के दरबार का पता पूछें भी तो किससे? कोई रुके तो सही, कोई सुने तो सही। आत्मा को भी जल्दी ही समझ में आ गया कि समस्या कहां है। तो उसने शरीर रूप धारण करने का फैसला किया। आत्माएं दूरदर्शी भी हुआ करती हैं। यह आत्मा भी चुपके से अपने झोले में अपने शरीर को फोल्ड करके ले आई थी।

अब इब्नबतूता की आत्मा, शरीर रूप में थी। लंबा कद, खिचड़ी दाढ़ी, सिर पर मोरक्कन पगड़ी जो कुछ-कुछ पठानी जैसी लग रही थी। शरीर रूपी आत्मा उस तुगलक के दरबार को ढूंढने लगी जिसने अपनी राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद शिफ्ट करने के आदेश दिए थे। उसी फरमान की वजह से इब्नबतूता की आत्मा अभी तक मोहम्मद बिन को ही ‘तुगलकी’ मानते आई है। उसे नहीं मालूम कि इन बीते सालों में हिंदुस्तान में न जाने कितने ‘तुगलकी’ और पैदा हो चुके हैं।

तभी इब्नबतूता की आत्मा को एक अति उत्साही यूथ नजर आया जिसके हाथ में बैनर था। वह शायद किसी रैली में भाग लेने जा रहा था। बैनर पर लिखा था- ‘आई सपोर्ट सीएए एंड एनआरसी’। हालांकि आत्मा को कुछ समझ में नहीं आया उसका मतलब। उसने इसका लोड भी न लिया। आत्मा ने उसी युवा को रोका और हिंदवी में पूछा, ‘भाई ये तुगलक का दरबार कहां है?’
युवा ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा और गुस्से में बोला, ‘स्साले, तेरी ये हिम्मत कि हमारे नेता को तुगलक बोले? कहां से आया है? यहां का तो नहीं लगता।’
आत्मा रूपी इब्नबतूता : जी, मैं पहले यहीं रहता था। कई साल यहीं रहा। फिर बाहर चले गया।
युवा : देखो, अब देश बदल गया है। कोई ऐरा-गेरा यहां नहीं रह सकता। रहना है तो सबूत पेश करना होगा।
इब्नबतूता : सबूत, कैसा सबूत जी?
युवा : आधार है?
इब्नबतूता : ये आधार क्या बला है?
युवा: हें? ड्राइविंग लाइसेंस तो होगा? अब यह मत पूछना ये क्या होता है।
इब्नबतूता: ये क्या होता है?
युवा : मुझे शकल से ही लग गया था कि तुम कोई उलझे हुए आदमी हो। अरे भाई ड्राइविंग लाइसेंस यानी जिस वाहन में तुम यात्रा करते हो, उसको चलाने का अनुमति पत्र।
इब्नबतूता : मैं तो पैदल चला हूं। या फिर घोड़े पर।
युवा: लगता है तुम सीएए विरोधी हो, तभी ऐसे कुतर्क कर रहे हों। स्वरा भास्कर के सपोर्टर हो?
इब्नबतूता (युवा की बात कुछ समझ में नहीं आई। कुछ देर की चुप्पी के बाद) : और कोई तरीका है जो बताए कि मैं यहीं रहता था कभी?
युवा : तो ऐसे तीन आदमी तो होंगे जो तुम्हें जानते हों? यह तो बहुत आसान है।
इब्नबतूता : भाई, मैं तो दूसरी दुनिया से आज ही उतरा हूं। न मैं किसी को जानता हूं, न कोई मुझे…
युवा : अच्छा जी, समझ गया, जेएनयू पासआउट हों! रुको जरा, बताता हूं…
और इतना कहकर युवा अपने कुछ साथियों को लेने मोटरसाइकिल पर गायब हो गया…
बतूता साहब की आत्मा अपने तुगलक को ढूंढने आगे बढ़ गई…

(क्रमश…)

(जयजीत ख़बरी व्यंग्यकार और ब्लॉग ‘हिंदी सटायर डॉट कॉम’ के संचालक हैं।)

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