#इब्नबतूता की आत्मा रिटर्न्स 14 : नेताओं की ‘ऑनलाइन बिक्री’ का क्रांतिकारी आइडिया

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By Jayjeet

लॉकडाउन के दौरान सबकुछ बंद है। जरूरी सामान को छोड़कर कुछ भी नहीं बिक रहा। जरूरी सामान भी क्या, दाल-चावल-आटा, सब्जी, दूध, बस। अब इब्नबतूता तो आत्मा ठहरी। उसे तो किसी चीज की दरकार नहीं। पर हर किसी की स्थिति इतनी सुविधाजनक नहीं है। कई लोग परेशान हैं। ऐसी ही एक परेशान काया से इब्नबतूता की आत्मा की मुलाकात हुई। अपने बंगले की छत पर वह परेशान काया सुबह-सुबह टहलते हुए मिली।

उस बड़ी-सी काया पर सफेद झक्क कुर्ता इस बात का प्रमाण था कि हाथ धोने के साथ-साथ महोदय कपड़े भी नियमित रूप से धुलवा रहे हैं। काया का डीलडौल भी यह बताने को काफी था कि भले आदमी को कम से कम अपनी सेहत की चिंता है। प्रधानमंत्रीजी की उस भावना को उन्होंने पूरी तरह से दिल पर ले लिया था कि सबसे पहले हम खुद स्वस्थ रहें। अगर हम खुद स्वस्थ रहेंगे तो देश भी स्वस्थ रहेगा।

इब्नबतूता की आत्मा बंगले की छत पर उतर गई। परेशान काया थोड़ी चौंकी। पर जब इस बात का भरोसा हो गया कि यह आत्मा उसे संक्रमित नहीं कर सकती तो वह थोड़ी रिलेक्स हुई और सोशल डिस्टेंस के साथ उसके साथ मॉर्निंग टॉक के लिए तैयार हो गई।
– बड़े परेशान नजर आ रहे हैं आप भाईसाहब। बतूता की आत्मा ने उसे खुरेचा।
– आपको तो मालूम ही है, फिर भी पूछ रही है। उस परेशान काया ने कहा।
– हां, लॉकडाउन है। लेकिन आपकी सेहत से तो ऐसा नहीं लगता कि आपको कोई परेशानी हो रही है।
– परेशानी क्यों नहीं होगी? सबकुछ बंद है। कुछ भी तो नहीं बिक रहा।
– पर आवश्यक चीजों की खरीद-बिक्री तो सब जारी है, किराने का सामान, दूध-दही, दवाइयां। इस माहौल में और क्या चाहिए? आत्मा ने पूछा।
– ‘मैं जनप्रतिनिधि हूं।’ काया के चेहरे पर गर्व का भाव तैर गया।
– यह तो अच्छी बात है। पर आपको तकलीफ क्या है?
– तकलीफ नहीं, बल्कि सख्त आपत्ति है कि हम जनप्रतिधियों को अति आवश्यक वस्तुओं की सूची में क्यों शामिल नहीं किया गया? क्या इस देश के लोकतंत्र को हमारी जरूरत नहीं है?
– हां, लोकतंत्र की मजबूती के लिए जनप्रतिनिधियों की ओपन मार्केट में खरीद-बिक्री जरूरी है। पर राज्यसभा के जो चुनाव होने थे, उनकी तारीख तो बढ़ा दी गई है। फिर अब खरीद-बिक्री की क्या जल्दबाजी? बतूता की आत्मा ने तर्क पेला।
– कोरोना के बाद भारी मंदी की आहट सभी सुन ही रहे हैं। चिंता क्यों नहीं होनी चाहिए? अभी हमारे जो दाम हैं, क्या बाद में वे मिलेंगे? परेशान काया ने अपनी मूल परेशानी बयां की।
– पर भविष्य की चिंता क्यों करते हो? टीवी पर रामायण नहीं देख रहे हो? उसमें यही तो बताया जा रहा है कि सब विधाता के हाथ में है। वर्तमान की चिंता करो, भविष्य की नहीं।
– रामायण कौन नहीं देखता? इससे पूर्व भी तीन बार देख चुके हैं। लॉकडाउन से पहले तो हम हर महीने सुंदरकांड भी करवाते थे। पर आत्मा जी, रामायण की बातें अलग हैं। कहां वे महान विभूतियां और कहां हम तुच्छ मानव। परेशान काया ने अपनी तुच्छता पर मोहर लगाई
– बिल्कुल, आपकी तुच्छता की महिमा तो अपरम्पार है। इसका जितना बखान किया जाए, कम है। पर एक आइडिया है, अगर आप जनप्रतिनिधियों की पूरी बिरादरी तैयार हो जाए? बतूता की आत्मा ने कहा।
– इसमें किसी को क्या दिक्कत होगी? बताइए ना क्या आइडिया है आपके पास? उछलते हुए काया बोली।
– ऑनलाइन… सरकार से मांग कीजिए कि अगर मार्केट में खरीद-बिक्री बंद है तो कम से कम ऑनलाइन यह सुविधा दी जाए। अब तो बहुत आसान है, रेट लगाने से लेकर ऑनलाइन ट्रांजैक्शन तक, सब कुछ।
– वाह, क्या आइडिया है! मैं अभी सभी जनप्रतिनिधियों की ओर से एक ऑनलाइन पीटिशन सरकार को भेजता हूं। …. और परेशान काया का चेहरा मास्क के अंदर से ही मुस्करा उठा।

(जयजीत ख़बरी व्यंग्यकार और ब्लॉग ‘हिंदी सटायर डॉट कॉम’ के संचालक हैं।)