#इब्नबतूता की आत्मा रिटर्न्स 11 : सरकारी दफ्तरों की प्रोडक्टिविटी पर आत्मा-ए-इब्नबतूता की गोपनीय रिपोर्ट

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By jayjeet

कुछ माह पहले इब्नबतूता की आत्मा ने धरती पर कदम रखे थे। आखिर उसे हिंदुस्तान की सरजमीं पर क्यों उतरना पड़ा, इसका खुलासा हम आज करते हैं। दरअसल, परलोक में एक विभागीय बॉस ने यमदूतों के लिए नया आइडिया दिया – तीन दिन काम, चार दिन आराम। इस आइडिया के पीछे उसका लॉजिक था कि इससे यमदूतों की प्रोडक्टिविटी में इजाफा होगा। धरती पर कई लोग यमदूतों के नाकारापन के कारण लंबे अरसे से कब्र में ही पैर लटकाए बैठे अपने नंबर का इंतजार करते रहते हैं। प्रोडक्टिविटी बढ़ने से वेटिंग लिस्ट कम हो सकेगी, ऐसा उस बॉस का मानना था। वह बॉस हर जगह ‘वॉट एन आइडिया सरजी’ कह-कहकर खुद ही अपनी पीठ ठोंकते रहता। लेकिन एक दिन उसके एक मुंहलगे यमदूत ने ही कई लोगों के सामने उसकी उतार दी, ‘बॉस, अब इतना भी न उड़िए। आपका आइडिया कुछ नहीं है। जरा हिंदुस्तान तो होकर आइए। वहां के सरकारी दफ्तरों में और भी एडवांस्ड फार्मूला लागू है – छह दिन काम और छही दिन आराम।

अपने इतने महान आइडिया की इतनी बेइज्जती बॉस सह न सका। पहले तो सोचा कि चलो खुद ही हिंदुस्तान चलकर देख आते हैं। लेकिन फिर लगा कि अगर खुद ही काम पर निकल पड़ेंगे तो बॉस कैसे कहलाएंगे। तो उन्हें इब्नबतूता याद आए। इब्नबतूता ने कुछ दिन पहले ही तफरीह के वास्ते हिंदुस्तान की धरती पर उतरने के लिए आवेदन दिया था। बॉस ने इब्नबतूता के आवेदन को आनन-फानन में अप्रूव कर दिया, लेकिन शर्त जोड़ दी कि उसे सरकारी दफ्तरों में ‘छह दिन काम और छही दिन आराम’ कांसेप्ट की सच्चाई पर रिपोर्ट भी सौंपनी होगी। तो शर्त का पालन करने के लिए धरती पर उतरने के बाद से ही बतूता की आत्मा ने चुपके-चुपके कई दफ्तरों के चक्कर लगाए। उसने परलोक के विभागीय बॉस को एक यमदूत के जरिए जो रिपोर्ट भेजी, पेश है उसका लब्बोलुबाब :

भारत के सभी सरकारी दफ्तरों में ‘काम’ के तीन चरण होते हैं। पहले चरण में ऑफिस पहुंचकर अपने टेबल के पास टिफिन बॉक्स रखा जाता है ताकि हाजिरी दर्ज हो सके, जैसे गुप्ताजी आ गए क्या? हां जी, टिफिन बॉक्स रखा तो है। पर इस हाजिरी से बड़ी हाजिरी दफ्तर के बाजू में किसी चाय की दुकान पर देनी होती है। यहीं से काम की असल शुरुआत मानी जाती है। एक-दो घंटे में चाय पीने के बाद दफ्तर का कम्प्यूटर खोला जाता है। काम का मुहुर्त कम्प्यूटर पर ही ताश के पत्तों जैसे गेम से होता है। काम के पहले हॉफ का समापन वे घर से लाए टिफिन से करते हैं। इसे बहुत आराम से खाया जाता है। इस दौरान वे फाइलों इत्यादि का कोई दखल बर्दाश्त नहीं करते। उनका सिद्धांत है – आराम से खाना भी न खाएं तो काम करने का क्या मतलब! आखिर आदमी काम करता ही क्यों है? पेट के लिए ना?

लंच के बाद दूसरा चरण शुरू होता है। इसमें पान या गुटखा खाया जाता है। वैसे तो पान-गुटखा खाने का क्रम पूरे ऑफिस टाइम के दौरान चलता रहता है, लेकिन लंच के बाद यह कम्पलसरी है। इसी से उन्हें काम करने की ऊर्जा मिलती है। थकान होने पर आराम भी इसी से मिलता है। पान-गुटखा खाने के बाद कुछ फाइलें देखी जाती हैं। उन्हें आगे बढ़ाना है या नहीं, इसका निर्धारण फाइल से संबंधित लोगों के साथ आपसी तालमेल से होता है। इसी दौरान अगर कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो, जो अमूमन चलता ही रहता है, तो मोबाइल पर स्कोर वगैरह देखने की ड्यूटी भी पूरी की जाती है। चूंकि यहां के लोग राजनीतिक रूप से बहुत सजग हैं। तो मोदी-राहुल इत्यादि के बारे में गंभीर चर्चा करना भी इनके काम का एक हिस्सा होता है।

तीसरे और अंतिम चरण में घर निकलने की तैयारी की जाती है। इस चरण तक आते-आते तमाम कर्मचारी काम कर-करके निढाल हो जाते हैं। सो, ऑफिस से अमूमन आधा-एक घंटा पहले निकलने की छूट है, ताकि चाय की दुकान पर थकान दूर करके ही घर की ओर प्रस्थान करें। इससे अगले दिन के लिए उनकी प्रोडक्टिविटी बनी रहती है।

इब्नबतूता की आत्मा ने अंत में लिखा, हालांकि छह दिन काम, छही दिन आराम के इस नियम में बीच-बीच में छुट्‌टी के रूप में बाधाएं भी आती हैं। कर्मचारियों के लिए छुट्टियां लेना कम्पलसरी हैं। वह इसका भी पालन तन्मयता के साथ करता है।

(जयजीत ख़बरी व्यंग्यकार और ब्लॉग ‘हिंदी सटायर डॉट कॉम’ के संचालक हैं। )