#इब्नबतूता की आत्मा रिटर्न्स – 3 : चश्मा पहनकर शादी की दावत में गई इब्नबतूता की आत्मा

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By Jayjeet

धरती पर उतरने के बाद इब्नबतूता की आत्मा सबसे पहले उसी तुगलक के दरबार को ढूंढने चली थी, जहां सदियों पहले उसने जज के तौर पर काम किया था। लेकिन आत्मा को जल्दी ही समझ में आ गया कि अब अपने उस तुगलक को ढूंढने का कोई मतलब नहीं है। यहां एक तुगलक ढूंढोगे तो हजार मिलेंगे। आत्माएं चूंकि ऊपर से उतरी होती हैं, इसलिए एक्स्ट्रा इंटेलीजेंट होती हैं। फिर यह तो इब्नबतूता की आत्मा ठहरी। यह तो ऊपर जाने से पहले ही डेढ़ गुनी साणी थी। ऊपर जाकर और साणी हो चली थी। कुल मिलाकर, इब्नबतूता की इस साणी आत्मा को धरती पर उतरने के कुछ ही घंटों में एहसास हो चला था कि यह उस दुनिया से बहुत अलग दुनिया है जिसे वह 650 साल पहले छोड़कर गई थी।

शरीर रूप में रह रही इब्नबतूता की आत्मा के लिए सबसे बड़ी दिक्कत थी उसकी वेशभूषा। हर कोई उसे शक की निगाहों से देख रहा था। उसकी दाढ़ी और उसकी वेशभूषा की वजह से कुछ लोग उसे खुलेआम धमकी भी दे गए थे- ‘बेटा, एनपीआर आ रहा है। देखते हैं, कैसा बचता है।’ इसी बीच, दिल्ली में ऐसी घटना हो गई जिससे उसे बचकर रहने का आइडिया मिल गया। उस घटना से उसे समझ में आ गया कि दिल्ली में नकाब पहनकर आसानी से रहा जा सकता है, बल्कि नकाब पहनकर वह कुछ भी कर सकती है, यहां तक कि गुंडागर्दी भी।

लेकिन गुंडागर्दी करने का उसका कोई इरादा नहीं था। उसका तो इरादा केवल नए हिंदुस्तान में रहकर नई-नई तहजीब़ों से रूबरू होना था। तभी उसे सामने शादी का विशाल मंडप नजर आया। पेट में चूहे भी कूद रहे थे। सोचा, चलिए नए हिंदुस्तान की ये शादी भी देख लेते हैं। उसे नकाब तो नहीं मिला, पर कहीं से काले रंग का चश्मा जरूर कबाड़ लिया।

शादी तो क्या थी, भव्य रिसेप्शन था। इब्नबतूता की आत्मा ने अपना पहला ट्रेवलॉग इसी दावत पर लिखा – ‘हर जगह खाने के स्टॉल ही दिखाई दे रहे थे। लोग वहां इतनी तन्मयता से जुटे हुए थे कि किसी की मुझ पर कोई नजर ही नहीं थी कि आखिर यह काले चश्मे वाला आदमी है कौन? ऐसे तो घुसपैठियों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, पर उस शादी में घुसे सबसे बड़े घुसपैठिये से बेफिकर थे लोग! तब मुझे ज्ञान मिला कि जब मामला खाने का हो तो हिंदुस्तानी फिर कहीं और फोकस नहीं करते।’

उसने आगे लिखा, ‘एक कोने में स्टार्टर लिखा हुआ था और वहां खाने की 40 से भी ज्यादा तरह की चीजें रखी हुई थीं। उससे आगे चला तो वहां मुझे मेन कोर्स लिखा मिला। वहां दस तरह के सलाद, अचार, पापड़, पच्चीस तरह की सब्जियां थीं। फिर एक जगह ढाबा लिखा हुआ था। वहां भी कई तरह की रोटियां और सब्जियां थीं। फिर मिठाइयां ही मिठाइयां, मानो मिठाई की दुकान सजी हो। मुझे यह देखकर ही बेहोशी छाने लगी थी, लेकिन मैं अपने आप को काबू में किए हुए था। फिर मैंने ऐसे कई लोगों को देखा जिन्होंने अपनी प्लेट में 25-30 चीजें रख रखी थीं। उनमें से कुछ अपने पेट के हवाले किए जा रहे थे तो कुछ कचरापेटी के हवाले। मुझे यह देखकर अच्छा न लगा। मैंने मन ही मन उनके लिए कुछ बद्दुआएं भी निकालीं। फिर मन को हल्का करने के लिए सोचा थोड़ा पानी पी लूं। पानी पीने गया तो वहां लोगों के बोल सुनकर मेरे होश ही उड़ गए। 25-30 आइटम खाने के बाद जब लोग पानी पीने आए तो आपस में बात कर रहे थे- अरे यार, खाने में मजा नहीं आया। इससे अच्छा खाना तो शर्माजी के यहां था।‘

आत्मा ने इस किस्से के अंत में लिखा – ‘उन लोगों की बातें सुनकर मेरी खाने की इच्छा ही मर गई। मैं बगैर खाए ही बाहर आ गई। आते समय देखा कि डस्टबीनों में ढेर सारा अधखाया भोजन पड़ा हुआ था। उधर बाहर ठंड में कांपते कुछ बच्चे बैठे थे, इस इंतजार में कि शादी खत्म हो तो उन डस्टबीनों पर अपना हक जताया जाए। अब समझ में आया, ये नेकदिल हिंदुस्तानी अपनी प्लेटों में इतना ज्यादा खाना लेकर क्यों फेंक रहे थे? शायद इन्हीं बच्चों के लिए। अल्लाह मुझे माफ करना, पता नहीं मैंने उन नेकदिलों के लिए क्या-क्या बद्दुआएं निकाल दी थीं…।’

(क्रमश : … )

(जयजीत ख़बरी व्यंग्यकार और ब्लॉग ‘हिंदी सटायर डॉट कॉम’ के संचालक हैं।)

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