#इब्नबतूता की आत्मा रिटर्न्स 10 : इब्नबतूता की आत्मा ने की गिरगिट के साथ चुहलबाजी

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By Jayjeet

आज इब्नबतूता की आत्मा दिल्ली के एक पॉश इलाके में है। इलाका पॉश है तो जाहिर है हर चीज भी बड़ी ज़हीन होगी… सड़कों से लेकर नालियां तक। और इतने दिन दिल्ली में रहते-रहते खुद बतूता की आत्मा भी तो आधुनिक रंग-ढंग में ढल गई है। मोरक्कन ड्रेस की जगह जींस और टी-शर्ट ने ले ली। खिचड़ी दाढ़ी भी स्टाइलिश हो गई है। कुल मिलाकर ऐसा मेकओवर हो चुका है कि पॉश इलाके के आइसक्रीम पॉर्लर में एक महंगी वाली आइसक्रीम का ऑर्डर दे सके।

उसके हाथ में जो आइसक्रीम का कप है, उस पर भी आधुनिकता का रंग चढ़ा हुआ है। जब आइसक्रीम ली थी, तो वह बैंगनी रंग की थी। लेकिन मुंह तक जाते-जाते उसका रंग गुलाबी हो गया। आइसक्रीम ने फिर रंग बदला और पीला हो गया। आत्मा का चौंकना लाजिमी थी। अब उसे क्या मालूम था कि वह स्पेनिश आइसक्रीम खा रही है। स्पेन की रंग बदलने वाली आइसक्रीम की हाल ही में कुछ पॉश इलाकों में आमद हुई है। दुर्भाग्य से यही आइसक्रीम बतूता की आत्मा के हाथ लग गई। घबराहट में आइसक्रीम वहीं छोड़कर आत्मा आइसक्रीम पॉर्लर से बाहर आ गई।

पॉर्लर से आत्मा इतनी तेजी से बाहर आई कि देखते ही देखते ही वह पॉश एरिया को भी पार कर गई। अब बतूता की आत्मा एक खुले एरिया में थी। यहां न कोई मॉल न था, न कोई आइसक्रीम पॉर्लर। आसपास कुछ पेड़ों पर खिले रंगीन फूल उसे जरूर इस बात का आभास दे रहे थे कि होली आने वाली है। तभी उसे एक पेड़ पर हरे रंग की कोई चीज नज़र आई। जमीन पर गिरते ही वह भूरी हो गई।

‘रंग बदलने वाली एक चीज से छूटकर आया तो रंग बदलने वाली दूसरी चीज के दर्शन हो गए’, बतूता की आत्मा ने सोचा। हालांकि आइसक्रीम की तरह वह बतूता की आत्मा के लिए अनजानी चीज नहीं थी। वह गिरगिट था। बतूता की आत्मा का गिरगिटों से उतना ही परिचय रहा है, जितना कि रंग बदलने वाले सियासतदानों से। आज सुबह से आत्मा की किसी से बात नहीं हुई थी और फिर रंग बदलने वाली आइसक्रीम वाला प्रकरण हो गया। तो मन बहलाने के लिए उसने गिरगिट से ही चुहलबाजी करने की सोची। आत्माओं की एक विशेषता यह भी होती है कि वे किसी से भी बात कर सकती है, इंसान ही नहीं, जानवर से भी।

‘गिरगिट जी नमस्कार, एक सवाल बहुत दिनों से मन में था। आपको देखकर ताजा हो गया।’

गिरगिट भी शायद फुरसत में था तो वह भी बोला, ‘आप आत्मा जी से मिलकर खुशी हुई। पूछिए ना,जो भी पूछना हो।’

आत्मा बोली, ‘सवाल यह है कि जिस तरह से आप अपना रंग बदलते हैं, क्या आपको देखकर ही सियासतदान भी रंग बदलना सीखे हैं?’

गिरगिट : ऐसा नहीं है। अगर आज के नेताओं की बात करें तो मैंने तो सभी नेताओं काे सफेद झक्क कपड़ों में ही देखा है। हां, कोई-कोई भगवा दुपट्‌टा ओड़ लेता है तो कोई नेहरू टोपी या लाल टोपी लगा लेता है।

इब्नबतूता की आत्मा : मैं सियासतदानों के कपड़ाें की बात नहीं कर रही हूं, उनके चाल-चरित्र की बात कर रही हूं।

गिरगिट: चलिए, चरित्र भी देख लीजिए। हर चरित्र पर काले धब्बे ही तो हैं। कहां रंग बदला? जैसे धब्बे पहले थे, वैसे धब्बे आज हैं। एकदम काले-काले।

बतूता की आत्मा को और भी चुहलबाजी सुझी। वह बोली, ‘लेकिन सियासतदान चाहे किसी भी पार्टी के हों, सत्ता के लालच में पाला बदल लेते हैं, जैसे आप रंग बदल लेते हो।’

गिरगिट अब थोड़ा उत्तेजित होने लगा था : ‘आत्मा जी, यह तो आप ज्यादती कर रही हैं। नेताओं के साथ हमारी तुलना ठीक नहीं है।’

‘लेकिन उन्हें रंग बदलना आपने ही तो सिखाया ना? यह बात मानते क्यों नहीं?’ आत्मा अब भी उसे छेड़ने के मूड में थी।

अब गिरगिट यह भूल चुका था कि वह किसी आत्मा से बात कर रहा है। वह जोर से चीखा : ‘हम रंग बदलते हैं क्योंकि प्रकृति ने हमें इसकी अनुमति दी है। आपके सियासतदान रंग बदलते हैं अपने स्वार्थ के कारण। इसलिए कहे देते हैं, अपने नेताओं की तुलना हमसे तो न कीजिए।’

बतूता की आत्मा ने हंसते हुए कहा, ‘गिरगिट भाई, इतना उत्तेजित मत होइए। नेताओं के साथ आपकी तुलना तो मैं कर ही नहीं सकती। कहां आप और कहां वे सियासतदान। बस मजाक कर रही थी। बुरा न मानो, होली है…!!!’

गिरगिट भी खिसियानी मुस्कान के साथ बोला, ‘हैप्पी होली।’

(जयजीत ख़बरी व्यंग्यकार और ब्लॉग ‘हिंदी सटायर डॉट कॉम’ के संचालक हैं।)