#इब्नबतूता की आत्मा रिटर्न्स – 8 : ‘ग्रेट वाल ऑफ़ इंडिया’ देखने आत्मा भी पहुंची अहमदाबाद

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By Jayjeet

आत्मा होने का एक सुभीता यह है कि कहीं आने-जाने के लिए टिकट नहीं कटाना पड़ता, न बस का और न ट्रेन का। जब मन करें, हवाई जहाज सरीखे उड़ जाओ और पलक झपकते ही मनमाफिक जगह पहुंच जाओ। इब्नबतूता की आत्मा ने पहली बार दिल्ली से बाहर निकलने का प्लान किया। वह कुछ ही सेकंडों में अहमदाबाद के आसमान में थी। दिल्ली के आकाश की तुलना में कहीं साथ-सुथरा आसमान। अहमदाबाद की दिव्य धरती पर उतरने से पहले आत्मा ने अपनी रूह का डिटॉक्सीफिकेशन करने का निश्चय किया। यह उचित भी था। पिछले दो माह में ही वाहनों के धुएं के साथ-साथ दिल्ली चुनावों के कारण न जाने कितना ही जहर उसकी रूह में घुस चुका था। उससे डिटॉक्स होने का एक ही तरीका था कि कुछ देर तक स्वच्छ आसमान में रहकर अनुलोम-विलोम किया जाए।

10 मिनट में आत्मा अपने डिटॉक्सीफिकेशन की प्रोसेस से निपट चुकी थी। अब एक डिटॉक्सीफाइड आत्मा के रूप में उसके कदम अहमदाबाद की जमीन पर हैं। वहां चप्पे-चप्पे पर पुलिस ही पुलिस नजर आ रही है। यह लाजिमी ही है। आखिर मिस्टर प्रेसिडेंट आने वाले हैं। लेकिन आत्मा की दिलचस्पी न तो ट्रम्प में है और ही उनके मेजबान में। उसकी दिलचस्पी तो बस एक ही चीज में है और वह है दीवार। उस चर्चित दीवार को देखने ही वह दिल्ली से अहमदाबाद तक आई है। कुछ दिन पहले यमलोक से नीचे उतरते समय आत्मा ने अंतरिक्ष से चीन की विशालकाय दीवार के दर्शन किए थे। तब उसे अंदाजा नहीं था कि इस दीवार को भी टक्कर देने वाली कोई दीवार हो सकती है। तब कल्पनाओं से परे थी यह बात। पर आज यह हकीकत है। ऐसी पुण्यात्माएं कम ही होती हैं जिन्हें एक ही अवतरण में दो-दो महान चीजों के दर्शन हो जाए। इब्नबतूता की आत्मा अब उसी पुण्यात्मा की श्रेणी में शामिल थी। चीन की महान दीवार के दर्शन कर ही चुकी थी। अब अहमदाबाद की महान दीवार के दर्शनों की बारी थी। इसलिए ज्यादा वक्त बर्बाद न करते हुए आत्मा सीधे उस दीवार के पास पहुंच गई। ताजी-ताजी बनी दीवार से तराई की खुशबू अब भी आ रही थी। दीवार मजबूत हो, इसके लिए तराई जरूरी होती है, चाहे ईंट-सीमेंट की दीवार हो या मज़हब की दीवार। मज़हबों के बीच दीवारें तो खून की तराई मांगती हैं। इसे अहमदाबाद से बेहतर कौन जान सकता है भला!

लेकिन अहमदाबाद ही इस चर्चित दीवार को देखने वह अकेली नहीं है। हजारों लोग दीवार के आसपास मौजूद हैं। कई लोग इस महान दीवार साथ सेल्फी लेने में व्यस्त हैं। विदेशों से सैकड़ों पत्रकार भी वहां आए हुए हैं। ये सब वे हैं जो प्रेसिडेंट ट्रम्प के दौरे को कवर करने के झूठे बहाने से दीवार देखने आए हैं। एक टूरिस्ट प्लेस जैसी बन गई है दीवार। ऐसी भी अफवाह है कि इसे और भी बेहतर टूरिस्ट प्लेस बनाने के लिए दीवार के पीछे स्थित कच्ची झुग्गियों को ठिकाने लगाने की भी योजना है। आखिर टूरिस्ट प्लेस पर झुग्गियां किसे अच्छी लगती हैं? हालांकि संबंधित अफसर ऐसी झूठी अफवाहों पर ध्यान न देने की बात करते हैं। उनका कहना है कि अगर झुग्गियों में रहने वालों को हटाएंगे भी तो भले ही शहर से बाहर ही सही, पक्के मकान जरूर दिए जाएंगे। अफसर इस बात को भी खारिज कर देते हैं कि गरीबी छिपाने के लिए यह दीवार बनाई गई है। उनके मुताबिक हमारे प्रधानमंत्रीजी ने कभी अपनी गरीबी नहीं छिपाई। हमेशा अपनी गरीबी का बखान किया है। तो भला इन गरीबों की गरीबी क्यों छिपाई जाएगी?

वहां पहुंचे पत्रकारों में अमेरिकी पत्रकार भी शामिल हैं। इन अमेरिकी पत्रकारों के बीच चर्चा है कि मिस्टर प्रेसिडेंट अहमदाबाद आ ही इसलिए रहे हैं ताकि वे मैक्सिको सीमा पर बनने वाली दीवार के कंस्ट्रक्शन के लिए भारत के साथ अरबों डॉलर की कोई डील कर सके।

सो, जितने मुंह उतनी बातें। उधर, दीवार की तारीफ सुन-सुनकर आत्मा एक गहन स्वप्न लोक में चली गई है। वह सपने में देख रही है – मोदीजी एक सूटेड-बूटेड आदमी का हाथ पकड़कर, बल्कि जबरदस्ती खींचकर, उसे दीवार की तरफ ला रहे हैं। उधर, दीवार के पार सैकड़ों लोग हाथ हिला-हिलाकर मिस्टर प्रेसिडेंट और मिस्टर प्राइम मिनिस्टर का अभिनंदन कर रहे हैं।

(जयजीत ख़बरी व्यंग्यकार और ब्लॉग ‘हिंदी सटायर डॉट कॉम’ के संचालक हैं।)

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