#इब्नबतूता की आत्मा रिटर्न्स – 5 : बजट पर हास-परिहास को देख आत्मा को मिली शांति

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By Jayjeet

इब्नबतूता की आत्मा को धरती पर उतरे अब कई दिन हो चुके थे। इस बीच वह शाहीन बाग के उस मजमे को भी देख आई थी, जहां हजारों लोग जुटे हुए हैं। सभी भयंकर गुस्से में, आसमां की ओर मुट्ठी तान-तानकर अपने आक्रोश का इज़हार करते। कुछ दिन पहले ही उसने बोलते आईने में ब्रेकिंग न्यूजों पर लोगों को एक-दूसरे पर चीखते हुए देखा था। और थोड़ा-सा ही अरसा हुआ था जब उसे गायों से भरे टैम्पो के पीछे लाठियां लिए कुछ लोग भागते दिखे, गुस्से से भरे। तो हर तरफ गुस्सा ही गुस्सा… तो क्या नए हिंदुस्तान में गुस्सा ही रह गया है? उसने सोचा।
इब्नबतूता की आत्मा यह सब सोच ही रही कि अचानक उसे हाथ में अखबार लिए एक आम आदमी नजर आया। खुशियां तो जैसे उसके चेहरे से टपक रही थी। उसे देखकर आत्मा के भी चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने रोककर पूछा – भाई, कौन हो तुम? इतने खुश क्यों हो?

उसने कहा – मैं आम आदमी हूं।

– पर आम आदमी तो इतना खुश कभी नहीं होता। तो तुम इतने खुश कैसे?

– क्योंकि बजट आया है।

– बजट! (कुछ देर सोचते हुए…) हां, वही ना पैसों का हिसाब-किताब? तो इसमें आम आदमी के खुश होने की क्या बात?

– मैं इसलिए खुश हूं कि वह समझ में आ गया है। और मैं बजट के इतिहास में बजट को समझने वाला पहला आम आदमी बन गया हूं।

और इसके साथ ही वह उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ गया…

आत्मा की आत्मा को इस बात से जरूर तसल्ली मिली कि गुस्से के बीच कहीं तो उसे कोई हंसता हुआ चेहरा मिला। हालांकि उसके लिए यह चकराने वाली बात भी थी। आखिर बजट से कोई आम आदमी इतना खुश कैसे हो सकता है? क्या वह आदमी मेरी जैसी कोई अन्य परम दिव्य ज्ञानी आत्मा तो नहीं जिसे बजट समझ में आ गया। आत्माएं इंटेलीजेंट हो जाती हैं, चाहे वह आम आदमी की ही क्यों न हों।

इब्नबतूता की आत्मा इस उधेड़बुन में ही लगी थी कि उसे चार आदमी हड़बड़ाए से अपनी ओर आते नजर आए। वे शायद किसी को ढूंढ रहे थे। आत्मा को देखते ही उसमें से एक ने सवाल दागा- क्या तुमने किसी पागल आदमी को देखा है जो खुद को आम आदमी बता रहा था?

इब्नबतूता की आत्मा चौंक गई – हां, पर उसे क्यों ढूंढ रहे हो?

खोजी दस्ते ने कहा –वह यह अफवाह फैला रहा है कि उसे आम बजट समझ में आ गया है। उसकी इसी अफवाह के कारण सब जगह अफरा-तफरी मची हुई है। मंत्राणी जी तक सदमे में हैं। विपक्ष के लोग आरोप लगा रहे हैं कि ऐसा घटिया बजट कैसे बना दिया कि आम आदमी तक समझ जाए।

आत्मा बोली – अरे हां, मुझे भी लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है? पर आप लोग कौन हों?

उसी खोजी दस्ते में शामिल एक कोटवाला आदमी बोला- ‘अब क्या बताएं, मैं वित्त मंत्रालय का सबसे बड़ा अफसर हूं। मैंने मैडमजी को समझाया भी कि आम आदमी से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। आम आदमी तो हमारे फोकस में रहता ही नहीं। पर मैडमजी ने हमारी एक न सुनी और फरमान सुना दिया – उस पागल आम आदमी को तुरंत पकड़कर लाओ, नहीं तो नौकरी खल्लास… बस ढूंढ रहे हैं उसे…।”

कुछ देर बाद… आखिरकार वह आम आदमी उन चारों की पकड़ में था। आत्मा के सामने से ही वे चारों उसे टांगाटोली करते हुए ले जा रहे थे। उसमें से एक यह भी कह रहा था- अबे मैडमजी का बजट भाषण पूरा तो हो जाने देता। उससे पहले ही तुझे यह मैसेज करने की क्या सूझी कि क्या शानदार बजट है… उससे उनकी तबीयत संसद में ही बिगड़ गई।

यह दृश्य देखकर बतूता की आत्मा तो खुश थी… चलिए, बजट के बहाने ही सही, इतने गुस्से भरे माहौल में कुछ तो हास-परिहास हुआ..।

(क्रमश: )

(जयजीत ख़बरी व्यंग्यकार और ब्लॉग ‘हिंदी सटायर डॉट कॉम’ के संचालक हैं।)