#इब्नबतूता की आत्मा रिटर्न्स 13 : इब्नबतूता की आत्मा बनी रिपोर्टर, पहले ही इंटरव्यू में ‘रोटी’ ने सुनाई खरी-खरी

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By Jayjeet

इब्नबतूता की आत्मा इन दिनों फ्री है, बिल्कुल वैसे ही जैसे सामान्य ड्यूटी वाले सरकारी कर्मचारी। घर पर भी कोई काम नहीं। टाइम पास करने के लिए अचानक उसे एक आइडिया सूझा। क्यों न वालंटियरली रिपोर्टिंग की जाए। अब ऐसे समय में जबकि पत्रकारों के लिए भी दिक्कतें बढ़ गई हैं तो उसे अपनी ओर से कुछ योगदान देना चाहिए। कोरोनावायरस का अब तब ऐसा वर्जन नहीं आया जो आत्माओं को संक्रमित कर सकें। तो आत्मा सेफ है और इसीलिए वह निकल पड़ी रिपोर्टिंग करने, ऐसे इंटरव्यू लेने जो एक इंसानी रिपोर्टर के बस की बात नहीं है।

वह दिल्ली की उस सड़क पर है जहां दो दिन पहले पलायन करने वाले मजदूरों का हुजूम लगा हुआ था। कुछ लोग अब भी इधर से उधर गुजर रहे हैं। लेकिन बतूता की आत्मा किसी इंसान से बात करने के मूड में नहीं थी। वह तो उस चीज की तलाश में थी जिसके लिए आदमी अपने घरों को छोड़ने को मजबूर होता है और इन दिनों उसी के लिए वह अपने-अपने घरों की ओर लौट रहा है। वह चीज है रोटी। आत्मा-ए-बतूता उसी रोटी की तलाश में है, ताकि उसी से पूछ सके कि आखिर उसमें ऐसा क्या है?

लेकिन रोटी आज सबसे लग्जेरियस चीज बन गई है। डबलरोटी के कई पैकेट तो उसे दुकानों पर नजर आए, लेकिन रोटी नहीं। काफी देर तक इधर-उधर घूमने के बाद उसे रोटी नसीब हो ही गई। सड़क के किनारे पड़ी हुई थी, बिल्कुल सूखी हुई। शायद किसी दुर्भाग्यशाली लेकिन आत्मस्वाभिमानी गरीब के हाथों से गिर गई होगी और फिर उसने उसे उठाना उचित न समझा होगा।

‘नमस्कार रोटी जी। क्या मैं आपसे बात कर सकती हूं?’ रोटी को झिंझोड़ते हुए आत्मा बोली।

रोटी ने अपनी बंद आंख खोली, धूल साफ करते हुए अंगड़ाई ली और उठ खड़ी हुई : जी, बोलिए।

मैं आत्मा-ए-इब्नबतूता। बस आपका इंटरव्यू लेना था।

रोटी : पूछिए, पर जरा जल्दी पूछिएगा।

इब्नबतूता : सबसे पहले तो यही पूछना है कि आप गरीब की रोटी है या अमीर की?
रोटी: आपका पहला सवाल ही गलत है। रोटी तो रोटी होती है, न अमीर की न गरीब की। उसका तो एक ही काम होता है खाने वाले का पेट भरना। हां, गरीब की रोटी सूखी हो सकती है, लेकिन उसके लिए तो वही मालपुआ होती है।

आत्मा : इन दिनों आप बड़ी डिमांड में है?
रोटी : यह भी गलत सवाल। मेरी डिमांड कब नहीं रहती? लगता है आपकी सोच आलीशान बंगलों में रहने वाले लोगों की सोच के ज्यादा करीब हैं। बस्तियों में तो मेरी हर समय मांग रहती है। लोग जीते भी मेरे लिए हैं और मरते भी मेरे लिए।

आत्मा : तो आपके कहने का मतलब है गरीब के हाथ में आपको ज्यादा सम्मान मिलता है, अमीर के हाथ में कम?
रोटी : आप नेताओं जैसी भेदभाव बढ़ाने वाली बात क्यों कर रहे हैं? हां, अमीर-गरीब के बीच भारी खाई है,लेकिन पेट की भूख तो अंतत: मुझसे ही मिटती है, भले ही अमीर की थाली में सौ पकवान ही क्यों न हों?

आत्मा : जब आपको कोई खाता है तो कैसा लगता है?
रोटी : भाई, ईश्वर ने मुझे पैदा ही इसलिए पैदा किया है कि दूसरों की खुशी के लिए मैं खुद को मिटा दूं। ऐसा करके मैं अपने कर्त्तव्य का ही तो पालन करती हूं।

आत्मा : अरे वाह, क्या नेक विचार है। अगर सभी इंसान भी आपकी तरह सोचने लगे तो शायद कोई भूखा न सोएं… अभी तो आपका यह विचार और भी प्रासंगिक हो गया है, सबका पेट भर सकता है।
रोटी : चलिए… अब दूर हट जाइए। बहुत देर से वह कुत्ता बड़ी लालसा के साथ अपनी जीभ लटकाए आपके हटने का इंतजार कर रहा है। अभी तो बेचारे जानवरों के सामने भी पेट भरने का संकट पैदा हो गया है। और हां, आपके सवाल बड़े कमजोर थे। अगली बार किसी से इंटरव्यू करने जाए तो तैयारी करके जाइएगा… अब अलविदा…।

(जयजीत ख़बरी व्यंग्यकार और ब्लॉग ‘हिंदी सटायर डॉट कॉम’ के संचालक हैं। )