काका हाथरसी की हास्य कविता : बापू के तीन बंदर

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महात्मा गांधी यानी बापू के तीन बंदरों पर जाने-माने हास्य व्यंग्य कवि काका हाथरसी भी कविता लिखने से स्वयं को नहीं रोक पाए। इस कविता में काका हाथरसी ( kaka hathrasi) ने आज के सिस्टम पर करारा व्यंग्य और कटाक्ष किया है। आप भी पढ़िए बापू के तीन बंदरों पर काका हाथरसी की यह हास्य-व्यंग्य कविता :

बंदर एक बता रहा, रखकर मुंह पर हाथ
चुप्पी से बनते चतुर, औंधू-भौंधू नाथ
औंधू-भौंधू नाथ, सुनो साहब-सरदारो
एक चुप्प से हार जाएं वाचाल हजारों
‘काका’ करो इशारों से स्मगलिंग का धंधा
गूंगा बनकर छूट, जोड़ कानूनी फंदा।

दूजे बंदर ने कहा – जो अब तक था शांत
हमने भी अपना सखे, बदल लिया सिद्धांत
बदल लिया सिद्धांत, कान पर रखो हथेली
करने दो निंदा करते हैं चेला-चेली
अवसरवादी बनो, परिस्थिति देखो जैसी
मंत्री पद के आगे दल की ऐसी-तैसी।

बंदर बोला तीसरा करके आंखें बंद
रिश्वत खाओ प्रेम से, भज राधे गोविंद
भज राधे गोविंद, माल उनका सो अपना
वेद-शास्त्र कह रहे, जगत् को जानो सपना
डूब गया परमार्थ, स्वार्थ से भरा समंदर
समय देखकर बदल गए ‘बापू’ के बंदर।

  • काका हाथरसी, हास्य-व्यंग्य कवि