Satire : आखिर देश की आत्मा को मिला चैन…

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By Jayjeet

देश की आत्मा बहुत दिनों से बेचैन थी। इसलिए नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल्स में लूट मची हुई है और सरकारें आंखें बंद करके बैठी हुई हैं। देश की आत्मा को मालूम है कि जहां भी लूट होती है, सरकारों की आंखें सबसे ज्यादा वहीं खुली होती है। एक्सपीरियंस है। तो सरकारों की तरफ से तो देश की आत्मा हमेशा से ही निश्चिंत रही है।

देश की आत्मा इस बात से भी बेचैन नहीं थी कि इतने बड़े-बड़े मसले आ रहे हैं और विपक्ष कुछ नहीं कर रहा है। देश की आत्मा अच्छे से जानती है कि विपक्ष कुछ कर भी नहीं सकता। जैसा भी है बड़ा ही प्यारा सा, मासूम सा विपक्ष है। देश की आत्मा ने विपक्ष की इस मासूमियत को स्वीकार कर लिया है। कोई गिला-शिकवा नहीं। तो विपक्ष की तरफ से भी निश्चिंत है देश की आत्मा।

तो फिर आखिर देश की आत्मा इतनी बेचैन क्यों थी? इसलिए थी कि देश में कोई डील हो और उसमें कोई लेन-देन ना हो, यह कैसे हो सकता था? वह भी हथियारों वाली डील!! जिस देश के कण-कण में एक भगवान* और दो भ्रष्ट लोग बसते हों, वहां ऐसा कैसे संभव है? क्या देश में ऐसा कोई शख्स हुआ है जिसने अपनी दो टके की मोपेड चलाने के वास्ते लाइसेंस बनाने के लिए व्हाया एजेंट टू आरटीओ बाबू अप-टू आरटीओ अफसर चाय-पानी के पैसे ना पहुंचाए हों। फिर यह तो राफेल है जिसकी औकात कम से कम मोपेड से तो ज्यादा ही होगी।

खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। भला हो फ्रांसीसी वेबसाइट का जिसने बताया कि रफाल के सौदे में 8 करोड़ रुपए किसी बिचौलिए को दिए गए। अब थोड़ा सुकून मिला। देश की आत्मा को ही नहीं, देश के 130 करोड़ लोगों की आत्माओं को भी। हालांकि सरकार के मंत्री अब भी बेशर्मी पर उतरे हुए हैं। नकार रहे हैं कि ऐसा कुछ ना हुआ जी … हम सब कुछ सहन कर सकते हैं, लेकिन ऐसी बेशर्मी कदापि नहीं। देश की 130 करोड़ आत्माएं छोड़ेंगी नहीं, हां …कोई भक्त-वक्त नहीं। आत्माएं सब समान होती हैं।

(* कृपया कोई बुरा न मानें। ‘भगवान’ में सभी जातियों, उपजातियों, पंथों, समुदायों, धर्मों और खेलों के भगवान शामिल हैं…)

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