हरिशंकर परसाई का क्लासिक व्यंग्य ‘पीढ़ियां और गिटि्टयां’

harishankar-parsai हरिशंकर परसाई

( Satire of Harishankar Parsai )

हरिशंकर परसाई

साहित्य के वयोवृद्ध थकित हुए।
वे लाठी टेकते हुए सड़क पर चलते।
मोटा चश्मा लगाकर चांद देखते।
निमोनिया की दवा जेब में रखकर बगीचे में घूमते।
कान में सुनने का यंत्र लगाकर संगीत-सभा में बैठते।
भोजन से अधिक मात्रा में पाचन का चूरण खाते।
एक दिन तरुणों ने उनसे कहा, ‘प्रात: स्मरणीयो, सुनामधन्यो! आप अब वृद्ध हुए, वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध और कलावृद्ध हुए। आप अब देवता हो गए। हम चाहते हैं कि आप लोगों को मंदिर में स्थापित कर दें। वहां आप आराम से रहें और हमें आशीर्वाद दें।’ देवता थोड़ी देर तक विचार करते रहे। फिर बोले, प्रस्ताव कोई बुरा नहीं है। पर हमारे यश का क्या होगा?
‘हम आपकी जय बोलेंगे।’ तरुणों ने कहा।
‘और हमारे झंडों का क्या होगा?’
‘हम आपके झंडों को मंदिर के सामने पीपल पर टांग देंगे। वे वहां ऊंचे फहराएंगे।’
‘और हमारे भोग का क्या होगा?’
‘हम आपके भोग का भी प्रबंध करेंगे। रोज हम पकवानों के थाल लेकर आएंगे।’
‘हमें श्रद्धा भी तो चाहिए। उसका क्या प्रबंध होगा?
‘हम रोज आरती करेंगे, चरणों में मस्तक रखेंगे।’
‘हमारे अर्थ का क्या होगा?’
‘आपकी रॉयल्टी हम मंदिर में ही पहुंचा दिया करेंगे। आपको हम हर पाठ्य-पुस्तक में रखवाएंगे और जो प्रकाशक धन देने में आनाकानी करेगा, उसे ठीक करेंगे।’
‘पर कर्म के बिना कैसे जीवित रहेंगे?’ वृद्ध ने कहा।
तरुणों ने समाधान किया, ‘जहां तक कर्म का संबंध है, आप लोगों की संस्मरण की अवस्था है। आप लोग आपस में संस्मरण सुनाएंगे ही। उनकी रिकॉर्डिंग होती जाएगी। और हम उनकी पुस्तकें छपवा देंगे।’
सयानों ने आपस में सलाह की और एकमत से कहा, ‘हमें मंजूर है। बनाओ हमें देवता।’
युवकों ने एक दिन समारोहपूर्वक वयोवृद्धों को देवता बनाकर मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया। उनके झंडे पीपल के पेड़ पर चढ़ा दिए। उनकी आरती की, उनके चरण छुए और भोग लगाकर काम पर चले गए।
देवता जब अकेले छूटे, तब ध्यान तरुणों पर गया।
एक ने बात उठाई, ‘लड़के अभी न जाने क्या कर रहे होंगे?’
‘सड़कों पर घूम रहे होंगे,’ दूसरे ने कहा।
तीसरा बोला, ‘कोई खा रहा होगा, पी रहा होगा।’
चौथे ने कहा, ‘कोई खेल रहा होगा।’
वे उदास हो गए। कहने लगे, ‘लड़के बाहर ऐसा आनंद कर रहे हैं, जीवन को इस तरह भोग रहे हैं! और देवता बने हम इस मंदिर की कारा में बैठे हैं।’
तभी एक देवता, जो अब तक चुप था, बोला, ‘खाने-खेलने दो लड़कों को। हम तो न चल सकते, न खेल सकते, न दौड़ सकते। ज्यादा खा लेंगे, तो अजीर्ण हो जाएगा। ज्यादा बोलेंगे, तो सांस फूल उठेगी। प्रेम करने की अवस्था नहीं रही। भोगने दो जवानों को जीवन। वे हमारी जय तो बोलते हैं, हमारे झंडे तो फहराते हैं, हमारी आरती तो करते हैं! और क्या चाहिए हमें!’
लेकिन बाकी देवताओं को उसकी बात अच्छी नहीं लगी। वे बोले, ‘तुम बिल्कुल नि:सत्व हो। तुम्हें इस बात का कोई बुरा तो नहीं लगता कि जहां-जहां हम थे, वहां-वहां वे जम गए हैं। जो हमारा था, वह सब उन्होंने ले लिया है, और हमें प्रतिमा बनाकर यहां चिपका दिया है।’
वह उठकर मंदिर के दूसरे हिस्से में चला गया।
देवताओं में सलाह होती रही। फिर उनमें हलचल हुई।
शाम को युवक जब थालियों में मिष्ठान सजाकर देवताओं की जय बोलते हुए मंदिर के पास पहुंचे, तो देखा कि सब देवता चबूतरे पर खड़े हैं। और वे हाथों में पत्थर भी लिए हैं। जवान आगे बढ़े, तो देवताओं ने उन पर पत्थर बरसाना शुरू कर दिया। तरुण रुक गए। चिल्लाए, ‘पत्थर क्यों मार रहे हो?’
देवता बोले, ‘वहीं रुको और सुनो। तुमने हमें वंचित किया है।’
‘किससे वंचित किया है?’ तरुणों ने पूछा।
‘उस सबसे, जो हमारा था।’ देवता उधर से चिल्लाए।
तरुणों ने जवाब दिया, ‘हमने तुम्हें वंचित नहीं किया। तुमने अपने आपको वंचित किया है। तुम्हारी थकान ने, तुम्हारी उम्र ने, तुम्हारी चेतना- दुर्बलता ने, तुम्हारी शक्ति-हीनता ने तुम्हें वंचित किया है। हम तो तुम्हें पूज रहे हैं और तुम देवता होकर पत्थर मारते हो!’
देवताओं ने कहा, ‘हमें ऐसी पूजा नहीं चाहिए। हम भी तुम्हें वंचित करेंगे।’
एक देवता बोला, ‘तुम उन सड़कों पर नहीं चलोगे, जिन पर हम चले। वे मात्र हमारी हैं।’ दूसरा देवता चिल्लाया, जो हमने खाया, वह तुम नहीं खाओगे, क्योंकि वह मात्र हमारा भोज्य था।’
तीसरा बोला, ‘जो हमने भोगा, वह तुम नहीं भोगोगे, वह मात्र हमारा भोग्य था।’
तरुणों ने कहा, ‘आप लोग देवता हैं, दरोगा नहीं। देवोचित व्यवहार करिए। आप जिए, इसलिए क्या जीवन पर सिर्फ आपका अधिकार हो गया, और कोई दूसरा जी भी नहीं सकता! हमें यह सब स्वीकार नहीं है।’
‘नहीं है तो लो’- कहकर देवताओं ने पत्थर बरसाना शुरू कर दिया। उन जवानों ने भी पास ही पड़े मिट्‌टी के ढेर से पत्थर उठाकर उन देवताओं पर फेंकने शुरू कर दिए। एक युवक पीपल पर चढ़ गया और दे‌वताओं के झंडे फाड़कर फेंक दिए। दोनों तरफ से पथराव हो रहा था।
एक राहगीर से दूसरे ने पूछा, ‘यह क्या मामला है?’
राहगीर ने जवाब दिया, ‘दो पीढ़ियों की कलागत मूल्यों पर बहस चल रही है।’

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