धीरज रखो, सबका विकास होई

(अतिथि व्यंग्यकार) अशोक मिश्र

गांव पहुंचा, तो रास्ते में मिल गए मुसई काका। मैंने उन्हें देखते ही प्रणाम किया, तो उन्होंने किसी लोक लुभावन सरकार की तरह आशीर्वाद से लाद दिया। मैंने देखा कि जिंदगी भर गटापारचा (प्लास्टिक) की चप्पल पहनने वाले मुसई काका स्पोर्ट्स शूज पहने मुस्कुरा रहे हैं। मैंने मजाक करते हुए कहा, ‘नथईपुरवा तो बहुत विकास कर गया है, गटापारची चप्पल से स्पोर्ट्स शूज तक।’ मेरी बात सुनते ही मुसई काका हंस पड़े और मेरा हाथ पकड़कर सड़क के किनारे बनी पुलिया पर छांव के नीचे घसीट ले गए और पुलिया पर बैठने का इशारा किया। बोले, ‘विकास की बात भले किया। मैं तो तुमसे पूछने ही वाला था कि हम लोगों का विकास कब होगा? यह विकास-विकास तो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। जो भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बनता है, तो सबसे पहले विकास करने की बात करता है। यह विकास आखिर है क्या? और कैसे होगा?’
मैंने अपने चेहरे पर बत्तीस इंची परमहंसी मुस्कान सजा ली, ‘काका! बचपन से लेकर पूरी जवानी तक आपने गटापारचा की चप्पल पहनकर काट ली, जवानी में जब आप बंगाल, पंजाब कमाने जाते थे, तो काकी को आपका हाल-खबर मिलने में महीनों लग जाते थे, लेकिन अब देखिए, आप बुढ़ापे में स्पोर्ट्स शूज पहनकर घूम रहे हैं। परदेश कमाने जाते हैं, तो घर से निकलते ही बस स्टैंड तक पहुंचने से लेकर जहां आप मजदूरी करते हैं, वह तक पहुंचने की राई-रत्ती खबर जो फोन पर देते रहते हैं, वह विकास नहीं है क्या? चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरे अस्पताल, घर-घर में दिन भर चिल्लपों मचाते टेलीविजन सेट। यही तो विकास है काका।’
मुसई काका ने अपनी गुद्दी खुजलाई। कुछ सकुचाते हुए बोले, ‘बेटा! हम आधा पेट खाए, फटी धोती पहन के जिंदगी काटे, तब जाकर चार पैसा जोड़ पाए और टीवी-फीवी, मोबाइल वगैरह खरीद पाए। इसमें सरकार का क्या है? पैसा लगाया, तो यह सुविधा मिल गई। सरकार हमारा विकास कब करेगी?’ मुसई काका ने तो मुझे फंसा ही दिया। मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘काका! यह बताओ, जब सरकार कहती है कि सबका विकास करना उसका पहला काम है, तो वह पहला काम कर रही है। आजादी के बाद से कर रही है। अब तक करती आ रही है। आपने यह तो सुना कि वह सबका विकास करेगी, लेकिन यह नहीं सुना कि वह अल्पसंख्यकों का सबसे पहले विकास करेगी। कहती है कि नहीं?’ अब फंसने की बारी मुसई काका की थी।
मुसई काका ने असमंजस भरे स्वर में कहा, ‘हां…कहती तो है, लेकिन इस देश के अल्पसंख्यक तो आजादी के बाद से अब तक वैसे ही हैं, जैसे पहले थे। उनमें राई-रत्ती फर्क आया हो, तो बताओ।’ मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘काका! आप अल्पसंख्यक किसको मानते हैं?’
‘अरे हम सब ही तो हैं अल्पसंख्यक।’ मुसई काका झुंझला उठे। मैंने कहा, ‘नहीं। देश में न हिंदू अल्पसंख्यक हैं, न मुस्लिम। न सिख अल्पसंख्यक हैं, न जैन, पारसी, ईसाई, बौद्ध। अल्पसंख्यक हैं, तो इस देश के पूंजीपति, उद्योगपति, अफसर और नेता। आप सोचिए काका, इस देश की एक सौ इक्कीस करोड़ की आबादी में पूंजीपतियों, उद्योगपतियों, अफसरों, नेताओं की आबादी कितनी होगी? मुश्किल से कुल आबादी का एक फीसदी। अब सरकार पहले इन अल्पसंख्यकों का विकास करेगी कि आप जैसे बहुसंख्यकों का। पहले इन लोगों का विकास हो जाने दो, आपका भी करेगी। जब सरकार ने कहा है, तो विकास जरूर करेगी। काका, धीरज रखो।’ इतना कहकर मैं आगे बढ़ गया। काका चिल्लाए, ‘ऐसे तो तीन-चार सौ साल में भी हम लोगों का नंबर नहीं आएगा। तब तक तो मुझे मरे हुए चार-साढ़े चार सौ साल हो चुके होंगे।’
मैंने पलटकर जवाब दिया, ‘तो इसमें सरकार क्या करे? सरकार ने कोई ठेका ले रखा है आप लोगों का।’ इतना कहकर मैं लंबे डग भरता हुआ घर चला आया।

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