चुनाव जीतने का नया फॉर्मूला : कोई भी आजमाएं, जीत की 100% गारंटी

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हिंदी सटायर पॉलिटिकल डेस्क। त्रिपुरा से चुनाव जीतने का एक नया फॉर्मूला निकला है। यह न जातिवाद पर आधारित है, न साम्प्रदायिकता पर। यह फॉर्मूला है वोटर लिस्ट मैनेजमेंट का। इसी वोटर लिस्ट के मैनेजमेंट की बदौलत बीजेपी बड़ी आसानी से लेफ्ट के अभेद्य गढ़ को भेद सकी।

क्या बला है यह वोटर लिस्ट मैनेजमेंट?

इसका खुलासा त्रिपुरा में बीजेपी के प्रभारी रहे सुनील देवधर ने खुद किया है। उनकी मानें तो त्रिपुरा की वोटर लिस्ट में कुल 48 हजार पन्ने थे। उन्होंने हर पन्ने का एक ‘पन्ना प्रभारी’ बना दिया। यानी 48 हजार पन्नों के लिए 48 हजार पन्ना प्रभारी। हर पन्ने में जितने मतदाताओं के नाम थे, उस पन्ना प्रभारी को केवल उनसे संपर्क करना था। उन्हें अपनी पार्टी की नीतियों व वादों के बारे में बताकर बीजेपी को वोट देने के लिए कन्विंस करना था। जिस तरह राज्य में बीजेपी का मत प्रतिशत पिछले चुनाव के डेढ़ फीसदी से बढ़कर इस बार 50 फीसदी हो गया, उससे साफ है कि पार्टी की यह ‘पन्ना प्रभारी’ वाली रणनीति काम कर गई।

तो क्या बीजेपी बाकी राज्यों में भी यह रणनीति अपनाएगी?

त्रिपुरा छोटा राज्य था तो यह संभव हो गया, लेकिन राजस्थान, मप्र या कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों में मुश्किल हो सकती है। हालांकि यह असंभव नहीं है, कम से कम बीजेपी जैसी कैडर बेस्ड पार्टी के लिए तो बिल्कुल नहीं। और फिर सिर पर RSS का हाथ हो क्या मुश्किल! इस फॉर्मूले का सफल इस्तेमाल यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान सीमित दायरे में ही सही, किया जा चुका है।

क्या कांग्रेस भी यह रणनीति आजमा सकती है?

हां, कांग्रेस भी यह मंत्र उधार ले सकती है। अगर एक-एक कार्यकर्ता को 50-50 पन्ने भी दे दिए जाएं और उनसे वोटरों से संपर्क करने को कहा जाए तो स्थिति काफी बदल सकती है। पर क्या कांग्रेसी कार्यकर्ता ऐसा करेंगे? इसका जवाब तो इटली से राहुलजी के लौटने के बाद ही दिया जा सकेगा।

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