No One Did 2-G Scam! इस तरह ‘तोते’ से ‘उल्लू’ बनी CBI?

2G-Scam , No one Killed Jessica, No One Did 2-G Scam, what said CBI special judge, what is 2-G Scam, 2 जी घोटाला क्या है?, 2G scam verdict, satire, सीबीआई को तोता क्यों कहते हैं?, उल्लू का महत्व
लो जी, हम तो बरी हो गए!

नई दिल्ली। ‘No One Killed Jessica’ की कैटेगरी का एक और क्लासिक एग्जाम्पल है – No One Did 2-G Scam. यानी किसी ने भी 2-G Scam नहीं किया। हो गया, यह अलग बात है। जिस देश में ड्राइविंग लाइसेंस भी बगैर रिश्वत के नहीं मिलता, वहां 2-G स्पैक्ट्रम ईमानदारी से बगैर लेन-देन के मिल जाएगा, यह बात तो शायद फैसला देने वाले जज साहब के भी गले नहीं उतरी होगी। लेकिन क्या करें? सीबीआई किसी के खिलाफ ढंग का कोई सबूत ही पेश नहीं कर पाईं। सभी आरोपी बाइज्जत बरी। हां, इस घटना के बाद सीबीआई का कलेवर जरूर बदल गया है। पहले वह ‘तोता’ थी। अब ‘उल्लू’ बन गई है।

पहले संक्षेप में जान लेते हैं कि क्या था कथित 2G Scam?

– साल 2008 में तत्कालीन UPA सरकार के कार्यकाल में 2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन किया गया। इस आवंटन पर 2010 में पहली बार सवाल तब उठा जब देश के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) ने अपनी एक रिपोर्ट में सरकार के खजाने को नुकसान पहुंचने की बात कही।

– CAG का कहना था कि ये स्पेक्ट्रम ‘पहले आओ और पहले पाओ’ की नीति पर दिया गया। और रेट लगाए गए 2001 के। दावा किया गया कि यदि लाइसेंस का आवंटन नीलामी के आधार पर होता तो खजाने को कम से कम एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए का फायदा हो सकता था।

– तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा पर आरोप लगा कि उन्होंने ‘पहले आओ और पहले पाओ’ की नीति के तहत अपनी पसंदीदा कंपनियों को फायदा पहुंचाया। राजा को 15 महीनों तक जेल में भी रहना पड़ा।

– तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की बेटी कनिमोड़ी को भी इस मामले में जेल की सजा काटनी पड़ी। (सीबीआई को कम से कम यह तो बताना था कि इनका असली नाम आखिर है क्या? – कनिमोझी, कणिमोई या कणिमोड़ी?)

तो क्या तोते से उल्लू बन गई सीबीआई?

इस मामले में सीबीआई की एकमात्र उपलब्धि शायद यही मानी जा सकती है! वह तोते वाली इमेज से बाहर आ गई। कैग ने अपनी रिपोर्ट में घोटाले की आशंका जताई, तब की विपक्षी पार्टी भाजपा ने इसे घोटाला ही घोषित कर दिया। अंतत: दबाव में आई तत्कालीन यूपीए सरकार ने अपने ‘तोते’ सीबीआई को मामले की जांच सौंपी। सीबीआई को भी लगा कि तोते के लबादे को उतारने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। बस, सबूत नहीं होने के बावजूद उसने उल्लू बनने (और बनाने) का फैसला लिया होगा। इसलिए जब सीबीआई जज ओपी सैनी कह रहे थे कि, “मैं पिछले 7 साल से सुबह नौ से 5 बजे तक पूरी निष्ठा से खुली अदालत में बैठता था और इंतजार करता था कि कोई आए और कानूनी तौर पर स्वीकार्य सबूत दें” , तो सीबीआई भी मन ही मन कह रही होगी, यह तो हमें भी मालूम था कि सबूत हैं कहां?

फिर भी सबसे आखिरी में वही सवाल अनुत्तरित रह गया?

अगर जेसिका को किसी ने नहीं मारा तो फिर उसका मर्डर कैसे हुआ? 2 जी केस में भी यही फलसफा जोड़ लीजिए…!

(Disclaimer : इस खबर के फैक्ट्स बिलकुल सत्य के करीब हैं। लिखने का अंदाज जरूर अनयूजवल है।)