Political Satire : जब राजा के दर्पण ने की दिल की बात

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By ए. जयजीत

सुबह नित्य कर्म, योगासन और ध्यान-स्नान से फ्री होते ही वे अपने बालों को संवारने के लिए हमेशा की तरह दर्पण के सामने थे। लेकिन बाल संवारते-संवारते आज उन्हें दर्पण में कुछ हलचल महसूस हुई। शायद दर्पण कुछ कहना चाहता है। हालांकि दर्पण कहना तो काफी दिनों से चाहता था, लेकिन महसूस उन्होंने आज किया। पर उनके सामने कुछ कहने की क्या कोई मजाल कर सकता है? इसलिए उनके ईगो को हलकी-सी ठेस लगी। वे एक कदम पीछे हो गए और फिर दर्पण से मुंह फेर लिया। लेकिन तभी उन्हें आवाज सुनाई दी – राजन ओ राजन…। यह आवाज दर्पण से ही आ रही थी।

आवाजों को इग्नोर करना उन्होंने सीख लिया था। राजा चाहे कोई भी हो, धीरे-धीरे इग्नोरेंस उसका स्थाई भाव बन जाता है। वे चाहते तो इस आवाज को भी इग्नोर करके अपनी राह पर आगे बढ़ सकते थे। यह उनकी प्रतिष्ठा में चार चांद ही लगाता। लेकिन फिर अभिमानी मन ही आड़े आ गया। तो दर्पण से दूर होते कदम ठिठक गए और चेहरा फिर से दर्पण की ओर घूम गया, मानो चुनौती देते हुए कह रहे हैं कि ए तुच्छ दर्पण, बता, क्या है तेरी रज़ा!

दर्पण धीरे से कुछ बुदबुदाया…. लेकिन आवाज साफ नहीं आ पाई। कॉन्फिडेंस का अभाव था।

“क्या तू कुछ कहना चाहता है दर्पण?’

“जी जी, मैं कुछ बातें करना चाहता हूं…।’ दर्पण के मुंह से हकलाते हुए कुछ शब्द फूटे।

“अच्छा, अपने मन की बात करना चाहता है?’ राजा अपनी चिर-परिचित शैली में मुस्कुराए।

“मन की बात तो राजन आप बहुत कर चुके, मैं तो दिल की बात करना चाहता हूं…’

“अच्छा! तू मेरा दर्पण होकर दिल की बात करना चाहता है? तुझे पता नहीं, राजाओं के महलों में लगे दर्पण कभी अपने दिल की नहीं करते?’

“हां, राजन। अच्छे से पता है। राजाओं के महलों के दर्पण भी बस राजाओं के प्रतिबिम्ब होते हैं। वे तो केवल राजाओं के मन की बात ही करेंगे। फिर भी आज दिल की कुछ कहना चाहता हूं, मगर …’

“मगर क्या?’

“बता तो दूं, मगर डरता भी हूं।’

“अरे, तू मेरा दर्पण है, तुझमें मेरा ही प्रतिबिम्ब है। तुझे इस बात का इल्म नहीं कि हमने कभी डरना सीखा नहीं, फिर तू कैसे डर सकता है?’ राजाओं का अभिमान पल-पल में जागता रहता है।

“डरता इसलिए हूं क्योंकि दिल, वह भी दर्पण का, कभी झूठ नहीं बोलता। और सच सुनाने की हिम्मत नहीं हो रही।’

“अच्छा, लेकिन ऐसा कौन-सा सच है जो हमसे छुपा हुआ है? मेरे दरबारी मुझे हमेशा सच से बाख़बर रखते हैं।’

“लेकिन दरबारी वही सच सुनाते हैं जो राजा सुनना चाहता है।’

“लेकिन तुम सच ही बोलोगे, इसका क्या भरोसा?’

“क्योंकि कहा ना, दर्पण झूठ नहीं बोलते।’

“इतना अभिमान?’

“सब आपसे ही सीखा राजन, आपके ही महल में रहते-रहते।’ शायद ज्यादा बोल गया दर्पण। इस बात का तुरंत एहसास होते ही उसने मिमियाती आवाज में एक ठहाका लगाया। ठहाका लगाने से वातावरण का तनाव दूर हो जाता है। इतने सालों में दर्पण ने यह भी सीखा और देखा है।

“हमसे और क्या-क्या सीखा?’ राजा ने भी चुटकी ली।

“खुद को पॉलिश करके रखना। देखो, कितना चकाचक हूं, आपके ही वस्त्रों की तरह।’ दर्पण अब थोड़ी सीमा उलांघने की गुस्ताखी करने लगा है।

“मतलब सूटेड-बूटेड होना गलत नहीं है ना!’ राजा को अब उसकी बातों में मजा आने लगा है। बातचीत इनफॉर्मल होने लगी है।

“बिल्कुल नहीं। यह तो विकास का एक बड़ा पैमाना है।’ राजा का दर्पण है तो बात कुछ-कुछ राजा के मनमाफिक करना भी जरूरी है।

“वाह दर्पण, तू ही है जो मेरे मन की बात अच्छे से समझता है। तू तो विकास का शोकेस बन सकता है, विकास का प्रतिबिम्ब।’

“अभी तो केवल आप मेरे सामने हैं। तो मैं फिलहाल आपका ही प्रतिबिम्ब हूं।’ अब दर्पण ने चुटकी ली। दर्पण थोड़ा-थोड़ा खुलने लगा है।

“बहुत डिप्लोमैटिक भी हो गया है रे तू।’

“यह भी आपसे ही सीखा है राजन।’

“तूने अच्छा किया जो मुझसे बात कर ली। मैं तो भूल ही गया था कि तेरा भी हम राज्य के हित में बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं।’ वही राजा कुशल होता है जो हर मौके पर अपने काम की बात निकाल ले।

“वह कैसे भला?’ दर्पण चाैंका। राजा की मंशा पर मन की मन शक करने की गुस्ताखी की।

“इन दिनों प्रजा के बीच विश्वास का बड़ा संकट है। राज्य के विकास संबंधित तमाम आंकड़े हम तेरे जरिए ही दिखाएंगे तो लोग सच मान लेंगे। क्योंकि भोली प्रजा भी तो यही मानती है कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता।’

“मगर गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई जैसे आंकड़ों का सच मैं कैसे छिपाऊंगा? मैं धोखा तो नहीं दे सकता।’ दर्पण ने अचानक अपनी औकात की सीमा के बाहर कदम रख दिया है।

लेकिन दर्पण की इस बात से राजा को गुस्सा नहीं आया, बल्कि उसकी मासूमियत पर मुस्कुरा भर दिए। राजा चाहते तो हंस भी सकते थे। बात ही इतनी हास्यास्पद थी। फिर भी मुस्कुराए भर।

“राजन, हर आंकड़े का सच प्रजा को मालूम होना ही चाहिए।’ दर्पण अब नैतिकता पर उतरने का दुस्साहस करने लगा है।

“तू बहुत छोटा है दर्पण। हर आंकड़ा तुझ में नहीं समा सकता। तो हम वही आंकड़े दिखाएंगे, जो राज्य के विकास का प्रतिबिम्ब दर्शाए।’ राजा ने बागी होते जा रहे दर्पण को बहलाने की कोशिश की।

“लेकिन मैं सहमत नहीं हूं।’ दर्पण की बदतमीजी बढ़ती गई।

“तू एक राजा के महल का दर्पण है। यह बात कैसे भूल गया?’ राजा का धैर्य जवाब दे गया। इसलिए मुट्‌ठी भींचकर राजा चीख पड़े। दर्पण भी एक पल के लिए कांप उठा, फिर संभलकर बोला, “गुस्ताखी माफ राजन, दर्पण तो दर्पण होता है, फिर वह गरीब की झोपड़ी में लगा हो या किसी राजा के महल में।’

दर्पण की जबान कड़वी होती जा रही थी। शायद दर्पण थोड़ा-थोड़ा स्वाभिमानी हो रहा था। फिर बात आगे बढ़ी… बढ़ती गई… बढ़ती ही चली गई… फिर इतनी बढ़ी कि दर्पण ने औकात की तमाम सीमाएं पार कर लीं।

मगर राजा तो राजा है। गुस्ताख दर्पण के साथ वही होना था जिसके वह लायक था। वह अब जमीन पर था। टुकड़े-टुकड़े। उस गुस्ताख दर्पण को सजा मिल चुकी थी। राजा की सहृदयता पर गुस्ताखी करने का नतीजा क्या होता है, दर्पण के उन टुकड़ों से यही कहने के लिए राजा नीचे की ओर झांके, थोड़ा झुके भी। लेकिन अब वहां एक दर्पण नहीं था। टुकड़े-टुकड़े कई दर्पण थे और सभी गुस्ताखी कर रहे थे। अपने दिल की बात सुना रहे थे। बात एक दर्पण ने शुरू की थी। अब कई दर्पण तक पहुंच गई थी। राजा ने घबराकर अपने हाथों से कान ढंक लिए। आंखें बंद कर ली। मुंह फेर लिया।

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। अपने इंटरव्यू स्टाइल में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)