Satire : संसद ने अपने प्रांगण में लगी बापू की प्रतिमा से क्या कहा?

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संसद भवन के प्रांगण में लगी गांधी प्रतिमा।

By ए. जयजीत

अरसा हो गया। इतने वर्षों से बापू को एक ही पोजिशन में बैठे हुए देखते-देखते। झुके हुए से कंधे। बंद आंखें। भावविहीन चेहरा। कहने की जरूरत नहीं, उम्मीद विहीन भी। चेहरा भावविहीन तो उसी दिन से हो गया था, जिस दिन देश को दो टुकड़ों में बांटने का निर्णय लिया गया था। निर्णय गैरों ने लिया था। उस पर कोई रंज नहीं था। पर मोहर तो अपने ही लोगों ने लगाई थी। इतनी जल्दी थी आजाद होने की, बापू के विचारों से आजाद होने की?

संसद अपने ही प्रांगण में लगी गांधी प्रतिमा को देखकर कुछ यूं ही सोच रही है। संसद को वैसे भी अब कुछ काम तो है नहीं। पक्ष-विपक्ष के सभी माननीय हंगामे में व्यस्त हैं तो संसद क्या करे? कुछ तो करे! तो इन दिनों वह वैचारिक चिंतन में लगी है। वैसे भी जब आदमी निठल्ला हो जाता है तो चिंतन में लग जाता है। संसद को तो निठल्ला बना दिया गया।

तो संसद का चिंतन जारी है। सोच रही है कि सालों पहले जब बापू को यहां बिठाया गया था, तब भी क्या ये ऐसे ही थे? क्या ये प्रतिमा तब भी इतनी ही गुमसुम-सी उदास थी? कंधे ऐसे ही झुके हुए थे? चेहरे पर इतनी ही विरानगी थी?

“याद क्यों नहीं आ रहा?’ संसद खुद पर भिन्ना रही है। अब क्या करें, वह भी बूढ़ी हो चली है। फिर ऊपर से अल्जाइमर का रोग अलग हो चला। भूलने का रोग। कई पुरानी बातें याद ही नहीं रहतीं। 1947 से लेकर अब तक न जाने कितने वादे किए, उनमें से कितने पूरे हुए, कितने अधूर रहे, कुछ याद नहीं।

हमेशा की तरह संसद आज फिर बेचैन है। जब भी संसद सत्र चलता है, तब वे ऐसे ही बेचैन हो जाया करती है। दुखी भी। तो दो दुखी आत्माएं। एक इस तरफ, दूसरी उस तरफ। एक ही नियति को प्राप्त। दुखी आत्माएं अगर आपस में बात कर लें तो मन हल्का हो जाता है, यही सोचकर संसद ने बापू को धीरे से पुकारा – “बापू, ओ बापू।’

पर बापू कहां सुनने वाले। संसद से उठने वाले अंतहीन शोर-शराबे, हंगामे, गालियों, प्रतिगालियों को वे सुन न सकें, माइक फेंकने से लेकर कागज फाड़ने जैसी करतूतें नजर न आ सकें, इसलिए उन्होंने सालों पहले से ही अपने कान और आंखें बंद कर रखी हैं। बापू ने जो सबक अपने तीन बंदरों को सिखाया था, उनमें से दो का पालन वे खुद बड़े ही नियम से करते हैं- बुरा ना सुनो, बुरा ना देखो। कहना तो 1947 के बाद तभी से बंद कर दिया था, जब उनकी बातों का बुरा माना जाने लगा था।

संसद को शायद मालूम है ये बात। तो उसने धीरे से बापू की प्रतिमा को झिंझोड़ा।

बापू को भी मालूम है कि उन्हें स्पर्श करने का साहस कौन कर सकता है। संसद ही। काजल की कोठरी में रहकर कालिख से कोई नहीं बच सका है, लेकिन माननीयों के साथ रहने के बावजूद संसद स्वयं में पवित्र है। यह छोटी उपलब्धि नहीं है। तो बापू ने आंख बंद किए ही पूछा- “बताओ, आज कैसे याद किया?’ सालों बाद वे बोले, मगर इतना धीमे कि जिसे केवल संसद ही सुन सके।

“बापू बहुत दिनों से बेचैन थी। सोचा आपसे बात करके मन को कुछ हल्का करुं?’

बापू मन में मुस्कुराए। बस, इसलिए कि बात ही कुछ ऐसी कर दी थी संसद ने। “एक बेचैन आत्मा से बात करके तुम्हें क्या चैन मिलेगा?’ बापू ने फिर धीरे से पूछा।

“आपने तो मुंह, आंख, कान बंद कर लिए। लेकिन मैं क्या करूं? अपने मुंह, आंख, कान बंद कर लूं, तब भी संसद में उठने वाले तूफानी हंगामे से कांप उठती हूं। क्या करुं मैं?’

“अगर इसका जवाब मेरे पास होता तो मैं खुद यहां यूं ना बैठा रहता, मूर्ति बनकर।’ बापू ने क्षोभ से कहा।

“पर बापू, इनमें से कई आपके पुराने अनुयायी हैं। कई नए भक्त भी बने हैं। आए दिन आपका नाम लेकर कसमें खाते हैं। मैं जानती हूं, सब झूठी कसमें हैं। फिर भी उन्हें एक बार तो अपनी कसम याद दिलवाइए। क्या पता, उसी से उनकी अंतरात्माएं जाग उठे।’ संसद ने बड़ी ही मासूमियत के साथ यह बात कही।

“इतनी भोली भी मत बनो। माननीयों को सबसे ज्यादा करीब से तो तुम्हीं ने देखा है। फिर भी ऐसी तर्कहीन बात। असत्य के साथ नित नए-नए प्रयोग करने वाले ये लोग मेरी बात सुनेंगे? इन्होंने तो अपने ही तीन बंदर क्रिएट कर लिए हैं – अच्छा मत सुनो, अच्छा मत देखो, अच्छा मत कहो।’

“बापू अब तो मुझे आत्मग्लानि होने लगी है। खुद पर ही शर्म आने लगी है।’

“ये तो सदा से रीत चली आ रही है?’

“कैसी रीत बापू? ‘

“जब घर के बच्चे बेशर्मी पर उतर आते हैं तो शर्म से गढ़ने का काम उस घर की दीवारों के जिम्मे ही आ जाता है। यही जिम्मा तुम निभा रही हो। पर तुम खुद को दोष मत दो।’

“पर आप भी खुद को ही दोष देते हों? मैं सालों से देख रही हूं कि 15 अगस्त आते ही आपका चेहरा और भी पार्थिव जैसा हो जाता है। ऐसा लगता है मानों पुराने दिन याद करके आपके मन में वितृष्णा-सी भर आई हो।

“अब मैं कुछ कहूंगा तो तुम कहोगी कि फिर वही घिसी-पिटी बात कह दी।’

“कह दो बापू। अब हमारे पास कहने के सिवाय बचा ही क्या है। कह दो, मन हल्का हो जाएगा।’

“बस, यही कि अगस्त पास आते ही जी घबराने लगता है। आजादी की जो लड़ाई लड़ी थी, वह व्यर्थ लगने लगती है…’ कहते कहते बापू का गला थोड़ा भर्राने लगा। कुछ देर मौन। फिर खुद को संभालते हुए बोले, “तुम कहां बैठ गई फालतू बातें लेकर, जाओ तुम यहां से।’

वे कुछ और फालतू बात कर सकें, इससे पहले ही संसद को कुछ आहट सुनाई दी। संसद ने तुरंत बापू को अलर्ट किया – “बापू सावधान! कुछ माननीय हाथों मंे तख्ती लिए, नारे लगाते हुए आपकी शरण में आ रहे हैं। लगता है कुछ घंटे आपके साथ ही बैठेंगे।’

और बापू फिर पहले वाली मुद्रा में आ गए।

संसद के सामने तो फिलहाल कोई रास्ता नहीं है, अपनी किस्मत को कोसने के सिवाय…

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

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