बाज़ार का ये हाल है (शैल चतुर्वेदी)

बाज़ार का ये हाल है
कि ग्राहक पीला
और दुकानदार लाल है।
दूध वाला कहता है-
दूध में पानी क्यों है, यह गाय से पूछो।
गाय कहेगी-
पानी पी रही हूँ
तो पानी दूंगी
दूध वाला मेरे प्राण ले रहा है
मैं तुम्हारे लूंगी।

धोबी कहता है-
राम ने धोबी के कहने से सीता को छोड़ दिया
आप एक कमीज़ नहीं छोड़ सकते?
सौ रुपल्ली की कमीज़ भट्टी खा गई
तो आप तिलमिला रहे हैं
इस देश में लोग ईमान को भट्टी में झोंककर
सारे देश को खा रहे हैं।

मक्खन वाला कहता है-
बाबूजी ये मक्खन है
खाने के नहीं, लगाने के काम में आता है
इसका इस्तेमाल त्रेता युग में विभीषण ने,
द्वापर में पांडवों ने किया था
आज भी सैकड़ों कर रहे हैं,
और जो नहीं कर पाए
वो हंस होकर भी घास चार रहे हैं।

चोर कहता है-
मुनाफ़ाख़ोर मुनाफ़ा खा रहे हैं
तो हम भी तिज़ोरियाँ तोड़-तोड़ कर
अधिकार और कर्तव्य को एक साथ निभा रहे हैं
किसी भी तिज़ोरी में झाँक कर देखिए
आत्मा हिल जाएगी
किसी न किसी कोने में पड़ी
लोकतंत्र की लाश मिल जाएगी।

किताबवाला वाला कहता है –
क्या कहा? प्रेमचंद का गोदान?
ये किताबों की दुकान है
किसी गौशाला में जाइये श्रीमान
यह नाम तो हमने पहली बार सुना है,
आपने भी कौन सा उपन्यास चुना है,
हम तो प्रेमकथाएं बेचकर बूढ़ों को जवान कर रहे हैं
मामूली दुकानदार हैं,
लेकिन राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण कर रहे हैं।

विद्यार्थी कहता है-
आप हमसे छह सवाल
तीन घंटे में करने को कहते हैं
गुरु जी! ये वो देश है
जहाँ एक हस्ताक्षर करने में चौबीस घंटे लगते हैं।

– शैल चतुर्वेदी, हास्य कवि